स्टाइल नहीं ’शराबी’ में मजबूरी थी जेब में हाथ डालना

“मूंछे हो तो नत्थूलाल जैसी……..”

 अगर इस डायलॉग से भी अगर कुछ याद नहीं आ रहा है, तो फिर ये समझा जाएगा कि जरूरत बादाम खाने की है। ’शराबी’ शब्द के साथ ही सबसे पहले दिमाग में क्या आता है, फिल्म शराबी, अमिताभ बच्चन वाली। ‘शराबी’, जिसके डायलॉग्स के साथ साथ गाने भी सुपरहिट थे। कहते हैं जब तक कोई शराबी ना हो, तब तक वो शराबी की एक्टिंग नहीं कर सकता। कहा जाता है कि रियल लाइफ में शराब को हाथ न लगाने वाले अमिताभ बच्चन ने बड़े पर्दे पर एक असली शराबी की एक्टिंग करके सबको गलत साबित कर दिया था। अमिताभ की ’शराबी’ अब से 35 साल पहले 18 मई 1984 को रिलीज हुई थी।

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अमिताभ ने एक बार अपने ब्लॉग में फिल्म के बारे में काफी कुछ बताया था। ये भी कि फिल्म का आईडिया कब और कैसे आया। उन्होंने बताया था कि वे लोग 1983 में हम लोग वर्ल्ड टूर कर रहे थे। फिल्म जगत के लिए वो अपने आप में एक अनोखे तरह का फिल्मी दौरा था। हम न्यूयॉर्क सिटी से त्रिनिदाद और टोबैगो के लिए फ्लाइट में जा रहे थे। तब प्रकाश मेहरा भी मेरे साथ ही थे। बातचीत के दौरान प्रकाश मेहरा ने मुझसे कहा कि क्यों ना हम बाप बेटे के रिश्तें पर एक फिल्म बनाएं, जिसमें बेटा शराबी हो। हम आधे रास्ते में पहुंच चुके थे और हवा में करीब 35,000 फीट की ऊंचाई पर थे, अटलांटिक महासागर के ऊपर। शायद इतनी ऊंचाई पर सब कुछ तय होना था और हो गया। किसी ने पलट कर नहीं पूछा कि ये फिल्म कैसे बनेगी और कब बनेगी।

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फिल्म शुरु हुई और शूट के पहले ही दिन अमिताभ ने एक बात नोटिस की। उनके डायलॉग बहुत ही ज्यादा लंबे थे। फिल्म में ज्यादातर उनका किरदार नशे की हालत में रहता था। इस पर उन्होंने प्रकाश मेहरा से कहा कि अगर डायलॉग इतने ही लंबे रहेंगे, तो फिल्म पाचं घंटे की बनेगी। क्योंकि एक आदमी जब नशे की हालत में होता है तो उसे बड़े डायलॉग बोलने में वक्त लगता है। इसलिए उन्होंने प्रकाश मेहरा को सलाह दी कि फिल्म में उनके डायलॉग छोटे रखें जाएं। उनके कहने पर ऐसा किया भी गया।

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अमिताभ ने पूरी फिल्म के दौरान अपना बायां हाथ अपनी जेब में ही रखा था। ये किया तो एक मजबूरी में गया था लेकिन फैंस के लिए वो एक स्टाइल बन गया। दरअसल उस दौरान अमिताभ के हाथ में भयंकर चोट लगी हुई थी। उन्होंने जो बताया उसके अनुसार ‘शराबी’ की शूटिंग के समय एक दिवाली बम मेरे हाथ पर गिर गया था। शूटिंग कैंसिल नहीं की जा सकती थी। डेट को भी आगे नहीं बढ़ाया जा सकता था। मैं भी किसी तरह की देरी करना नहीं चाहता था। इसीलिए मैंने शूटिंग नहीं रोकी। मेरे हाथ का पूरी तरह से भर्ता बन गया था। वो बिल्कुल कच्चे पक्के तंदूरी चिकन के जैसा लग रहा था। मेरे हाथ का हर एक हिस्सा गल गया था। लेकिन मैंने अपना काम नहीं छोड़ा अमिताभ उस चोट को छुपाने के लिए अपना हाथ जेब में रखे रहे और वो उनका सिग्नेचर स्टाइल बन गया।

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फिल्म में जो डाॅयलाग हिट हुए वह भी कमाल के थे, ’हमारी जिंदगी का तंबू तीन बम्बुओं पर खड़ा हुआ हैं शायरी, शबाब और आप। ’शराबी को शराबी नहीं तो क्या पुजारी कहोगे? गेंहू को गेंहू नहीं तो क्या ज्वारी कहोगे’।
’जिसने पी नहीं व्हिस्की, किस्मत फूट गई उसकी।
’शराब की बोतल पर अगर मैं लेबल की तरह चिपक गया हूं, तो उस लेबल को चिपकाने वाले आप हैं। ये इंसान नहीं है, ये तो मशीन है. ऐसी मशीन जो सिर्फ नोट छापती है और नोट खाती है।’

चीयर्स डेस्क

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