मंटो पीते थे और सम्पादक इसका फायदा उठाते थे

भारतीय उप महाद्वीप में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के साहित्य जगत में फिक्शन राइटर के रूप में उर्दू अफसाना निगार सआदत हसन मंटो की कहानियां दोगले समाज के मुंह पर तमाचा मारती नजर आती हैं। इस समाजिक पाखंड पर मंटो से अधिक दमदार फिक्शन शायद किसी ने नहीं लिखा। मंटो ने अपनी जिंदगी भी उसी बेबाकी से जी जो उनकी कहानियों में नजर आती है। उन्होंने जिंदगी को पूरी ईमानदारी से कहानियों में उतार दिया।

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सआदत हसन मंटो की 18 जनवरी 1955 को मृत्यु हो गई थी लेकिन आज भी वे अपने अफसानों की वजह से पॉपुलैरिटी के मामले में छाए हुए हैं। मंटो के अफसाने आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने उस समय हुआ करते थे। यही नहीं आज के दौर में तो वो और भी प्रासांगिक लगते हैं।

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अभी पिछले साल विख्यात अदाकारा नंदिता दास ने उनके जीवन पर आधारित एक फिल्म ’मंटो’ का निर्देशन किया। जिसमें नवाजुद्दीन सिद्दीकी मंटो के रोल में नजर आए थे। इससे पहले मंटो की लोकप्रिय कहानी टोबा टेक सिंह पर केतन मेहता ने फिल्म बनाई और इसमें लीड रोल में पंकज कपूर ने एक्टिंग की थी।

मंटो का जन्म 11 मई, 1912 को लुधियाना के एक बैरिस्टर के परिवार में हुआ था। मंटो कश्मीरी मूल के थे और उन्हें इस बात का बहुत गर्व करते थे। मंटो ने पढ़ने की शुरुआत रूसी लिटरेचर से की थी। उन्होंने 22 कहानी संग्रह, एक उपन्यास, रेडियो नाटकों की पांच सीरीज, रेखाचित्र के अलावा निबंध भी लिखे। उन्होंने बाॅलीवुड में काम किया, अशोक कुमार उनके दोस्त थे। मंटो पर 6 बार अश्लीलता के आरोप लगे लेकिन उन्हें कभी भी सजा नहीं हुई। ये मुकदमे उनके अफसानों बू, काली शलवार ,ऊपर-नीचे, दरमियां, ठंडा गोश्त, धुआं पर मुकदमे चले।

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सआदत हसन मंटो खूब पीते थे। लत की हद तक। नंदिता दास ने जो फिल्म बनाई है उसमें भी उनकी शराब पीने की आदत को काफी प्रमुखता दी है। पाकिस्तान में भी उन पर जो सीरीज और फिल्म बनी, उसमें भी उनके शराब के लती होने को प्रमुखता दी गई है। लेकिन क्या मंटो सिर्फ शराब ही पीते रहते थे। ऐसा तो नहीं है, मामला दरअसल ये है कि लेखक जो कल्पनाशील और सर्जक होता है, उसकी संवेदनाएं शायद ही कोई समझे। इस कारण उसे शराब की जरूरत पड़ती है। इसी का फायदा समाज उठाता है। मंटो को भी शराब की लत की वजह से बहुत संघर्ष देखना पड़ा। मंटो की शराब की लत का फायदा संपादक भी उठाते थे। संपादक कई बार मंटो को एक शराब की बोतल का लालच देकर कहानी लिखवा लेते थे। मंटो को उनके नेचर की वजह से लोग टॉमी बुलाते थे और मंटो मैट्रिक में उर्दू में दो बार फेल हो गए थे। मंटो कोई भी कहानी लिखने से पहले 786 लिखते थे।

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सोहराब मोदी की “मिर्जा गालिब” की कहानी मंटो ने ही लिखी थी। “मिर्जा गालिब” को 1954 के नेशनल फिल्म अवार्ड से नवाजा गया था। मंटो को तांगे की सवारी करना बेहद पसंद था और वे तांगे में हमेशा पीछे की ओर बैठते थे। यही नहीं, मंटो एक ही सिटिंग में पूरी कहानी लिख दिया करते थे।

चीयर्स डाॅट काॅम की पूरी टीम ने उर्दू के इस महान लेखक को उसके 93 वें  जन्म दिन पर याद किया ।

चीयर्स डेस्क 

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