शराब कारोबारियों के ठेंगे पर यूपी सरकार का शासनादेश

यूपी सरकार का शराब की दुकानों के आवंटन से जुड़ा शासनादेश शराब कारोबारियोें के ठेंगेे पर है। इसकी खास वजह यह कि कागजों में भले ही सिंडीकेट प्रथा को तोड़े जाने का दावा किया जा रहा हो मगर पूर्वांचल में सिंडीकेट ही हावी  हैं इस शासनादेश के लागू होने के बाद। ये ऐसा इलाका है जहां शराब की एक या दो दुकानें चलाने वाले बेरोजगारों की संख्या काफी कम है। सिंडीकेट प्रथा को तोड़े जाने से पहले ये परिकल्पना की गई थी कि इससे बेरोजगार लाभान्वित होंगे और वह एक दो दुकानें लाटरी पद्धति से पाकर अपनी रोेजी रोेटी का इन्तजाम कर सकेंगे। पूर्व की सरकारों में ऐसा होता भी रहा और एक दो दुकानें चलाने वालों की संख्या काफी अधिक रही। इसके विपरीत इस सरकार में यह संख्या काफी घट गई है और ऐसे लोगों की संख्या अधिक हो गई है जो दर्जन भर से अधिक दुकानें चला रहे हैं। इस तरह से शराब कारोबार चन्द हाथों की कठपुतली बनकर रह गया है।

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इस सरकार में ऐसा क्या हुआ कि शराब कारोबार चन्द हाथों की कठपुतली बन गया, ये एक विचारणीय प्रश्न है। पिछली सरकारों में यह होता था कि जिला स्तर पर सभी आवेदकों के सामने बच्चों से पर्ची निकलवायी जाती थी और जिसके नाम की पर्ची निकलती थी, उसेे संबंधित दुकान आवंटित कर दी जाती थी। इस सरकार में यह व्यवस्था खत्म कर दी गई। इस सरकार की नई व्यवस्था के अनुसार जिला मुख्यालय पर आवेदक एक जगह इकट्ठा होते हैं और प्रदेश मुख्यालय से दुकान के नाम के साथ आवंटी का नाम घोषित कर दिया जाता है। यह व्यवस्था ठीक उसी तरह से लूटतंत्र की तरह है, जैसे पहलेे जीत वाली लाटरी का नम्बर घोषित कर दिया जाता था। कहा तो यहां तक जा रहा है कि जिन लोगों की शासन सत्ता में पैठ है, सेटिंग से उनके नाम अधिक से अधिक दुकान आवंटित होे जा रही है। सब मिलाकर भ्रष्टाचार का खुला खेल चल रहा है।

एक दो दुकानें चलाने वाले घाटे में

शराब की एक दो दुकानें चलाने वाले ठेकेदार घाटे में चले जा रहेे हैं। इसकी वजह ये कि इनके इर्द गिर्द मौजूद शराब के बड़े कारोबारी इन छोटे कारोबारियों को तोड़ने के लिए कुछ दिनों तक अपनी दुकान से सस्ते में शराब बिकवाने लगते हैं। ऐसे में वह ग्राहकों को तोड़ लेते हैं। साथ ही एक दुकान पर खर्च अधिक गिरता है। वजह यह कि एक दुकान के लिए भी कम से कम तीन कर्मचारी रखने पड़ते हैं। दो कर्मचारी दिन व रात के शिफ्ट की ड्यूटी के लिए होते हैं तो एक कर्मचारी अन्य कार्य के साथ ही अनुपस्थित कर्मचारियों के स्थान पर ड्यूटी के लिए होते हैं।

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इसके विपरीत जो कई दुकानें चलाते हैं वह हर दुकान के लिए दो कर्मचारी रख लेते हैं और दो तीन अतिरिक्त कर्मचारी रख लेते हैं जो सभी दुकानों की व्यवस्था देखते हैं और जिस किसी दुकान पर जिस दिन कोेई कर्मचारी अनुपस्थित रहता है, उसकी जगह ड्यूटी कर लेते हैं। इस तरह बड़े कारोबारियों का खर्च कम होता है। ऐसी स्थिति में छोटे कर्मचारी औने पौने दाम पर अपनी दुकान बड़े कारोबारियों को बेच देते हैं। इस तरह से बड़े कारोबारियों के दुकान में और भी वृद्धि हो जाती है।

आजमगढ़ से संदीप अस्थाना

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