बिहार की शराबबंदी, चुनावी मुददा और धनबल की ताकत

बिहार में शराबबंदी चुनाव प्रचार में छाई रही। विपक्षी नेताओं ने इस बहाने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर हमले किए। विरोधियों ने इसे असफल बताया। वास्तविकता जो भी हो सरकारी आंकड़े खुद कह रहे हैं कि बिहार में शराबबंदी सफल नहीं हो पा रही है। बिहार में शराबबंदी कानून के तहत बिहार में अब तक एक लाख से भी ज्यादा मामले दर्ज किए जा चुके हैं और करीब डेढ़ लाख से भी ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है।

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बिहार में शराबबंदी सफल हुइ या नहीं, इसको लेकर जब तब बयानबाजी होती रही है। चुनाव प्रचार के दौरान राजद नेता तेजस्वी यादव ने बछवाड़ा की रैली में कहा था कि नीतीश कुमार ने बिहार में शराबबंदी लागू तो की लेकिन उसका कोई असर नहीं दिखता है। लोग अभी भी जम कर पी रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना पड़ा है कि 200 रुपए वाली बोतल 1500 में मिल रहा है। उनका सवाल है कि 1500 और 200 के बीच का जो कमीशन है 1300 रुपए का वह किसको मिल रहा है।

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लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी चुनावी सभाओं में फिर से महिलाओं को शराबबंदी पर साथ आने की अपील की है। भाजपा भी नीतीश सरकार के इस फैसले के साथ है। हालंकि तेजस्वी यादव वाली पार्टी राजद ने अपने मैनिफेस्टो में शराबबंदी कानून में संशोधन की बात की है। वह संशोधन कैसा होगा, ये स्पष्ट नहीं किया गया है। राजद के की घोषणा है कि उसकी सरकार बनी तो पहले उन सभी गरीबों पर से मुकदमे वापस लिए जाएंगे जिन्हें इस कानून के तहत जेल में ठूंस दिया गया है।

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बिहार में करीब तीन साल पहले शराबबंदी लागू की गई थी। इन तीन सालों के दौरान ऐसा कोई दिन बिहार में नहीं बीता जिस दिन शराबबंदी से जुड़़ा कोई न कोई मामला पुलिस ने दर्ज न किया हो। स्पष्ट है कि शराबबंदी प्रभावी नहीं हो पा रही है। बिहार के डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे बताया कि बिहार में शराबबंदी कानून के तहत अब तक कुल 116,670 मामले दर्ज हुए हैं। इस सम्बंध में 161,415 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इनमें से 13214 लोगों पर शराब का अवैध व्यापार का आरोप है। इस अवधि में कुल 50,63,175 लीटर शराब बरामद की जा चुकी है।

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इस शराबबंदी के आंकड़ों का हिसाब किताब किया जाए तो पहली अप्रैल 2016, जब बिहार में शराबबंदी लागू हुई, तब से लेकर इस साल 31 मार्च, 2019 तक औसतन हर एक मिनट में कम से कम तीन लीटर शराब की बरामद की गई और 10 मिनट के अंदर किसी न किसी व्यक्ति को शराबबंदी कानून की खिलाफवर्जी करते हुए गिरफ्तार किया गया।

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इतना ही नहीं इसी अवधि में उन 430 पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई की गई है जो किसी न किसी रूप में शराबबंदी कानून की अवहेलना के दोषी पाए गए। इनमें से करीब 50 पर तो इतने गंभीर आरोप हैं कि उन्हें बर्खास्त करना पड़ा और लगभग दो दर्जन सब इंस्पेक्टर्स पर इतनी संगीन कार्रवाई हुई है कि वे अगले दस साल तक थाने के इंचार्ज नहीं बन पाएंगे। सवाल ये है कि बिहार में शराबबंदी कानून के उल्लंघन के पीछे वास्तव में है कौन। समाज या सियासी लोग या वह ताकत जो इन सबके मिश्रण से आती है।

चीयर्स डेस्क

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