अभी भी नहीं टूट पाया है शराब का सिंडीकेट

अभी ज्यादा दिन नहीं हुए हैं जब यूपी ही क्या पूरे उत्तर भारत में शराब व्यवसाइयों का अपना एक अलग ही रुतबा हुआ करता था और इस रोब दाब का नतीजा यह था कि इन चंद व्यवसाइयों के अलावा किसी की हिम्मत ही नहीं होती थी जो शराब के कारोबार में हाथ डालता। लेकिन पिछले दशक में कुछ तब्दीली आई और यूपी सरकार की आबकारी नीतियों में इस तरह के प्रावधान किए गए कि नए व्यवसाई भी इस ट्रेड में आ सकें।

इस आबकारी नीति का ही नतीजा है कि फिलहाल यूपी की राजधानी लखनऊ में  पिछले कुछ वर्षों में नए व्यवसाई शराब के कारोबार में शामिल हो गए हैं। लेकिन अभी भी पुराने शराब कारोबारियों को सिंडीकेट टूट नहीं पाया है। उनके रिश्ते नाते वालों के नाम से अभी भी यही लोग बाजार पर हावी हैं। लखनऊ शराब एसोसिएशन के महासचिव कन्हैया लाल मौर्या ने चीयर्स डाॅट काॅम से विशेष बातचीत में इस कारोबार की वास्तविकताओं के बारे में बताया।

उनके अनुसार लखनऊ और आसपास के शहरों में कौन सा ब्रांड उतारा जाएगा। किस ब्रांड को ज्यादा महत्व दिया जाएगा, कौन सा ब्रांड कम बिकेगा, अभी भी यही सिंडीकेट तय कर रहा है। श्री मौर्या का कहना है कि सिंडीकेट की मर्जी से ही कम्पनियां यहां अपने ब्रांड लांच करने को बाध्य हैं। उनके अनुसार जब तक शराब कम्पनियों पर इस सिंडीकेट की पकड़ बनी रहेगी, लखनऊ ही क्या, कानपुर और इलाहाबाद हो या फिर वाराणसी, शराब उपभोक्ताओं को उनकी मर्जी की शराब शायद ही मिल पाए।

श्री मौर्या का कहना है कि पहले आबकारी नीतियां जो बनती थीं, उनमें इस तरह के प्रावधान थे कि एक वर्ग विशेष का प्रभुत्व था। यही वर्ग विशेष था जो जिसको चाहता था उसे लिकर शाॅप मुहैय्या करा देता था। काफी कोशिशों के बाद आबकारी नीति में प्रावधान कराए गए कि यह बाजार भी सभी के लिए खुले, कोई भी व्यक्ति इस कारोबार को कर सके, तो अब स्थिति यह है कि बीस तीस प्रतिशत नए व्यवसाई शराब ट्रेड में शामिल तो हो चुके हैं। लेकिन वह कोई बड़े निवेशक नहीं हो पा रहे हैं। उन्हें इस ट्रेड में वह सुविधाएं नहीं मिल रही हैं जो पुराने लोगों को मिल जाया करती थीं। इसीलिए अभी भी पुराना सिंडीकेट बाजार पर हावी है।

उन्होंने बताया कि शराब सिंडीकेट के लोग अभी भी अपने रिश्ते नातेदारों के नाम पर अच्छी और शहर की प्रमुख स्थानों वाली दुकानों और विशेष रूप से माॅडल शाॅप्स को अपने लोगों को दिला देते हैं। श्री मौर्या के अनुसार आबकारी विभाग के अधिकारी भी इस सिंडीकेट को बढ़ावा देने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। पुरानी रीति चली आ रही है, वहां पर नए व्यवसाइयों को समुचित सहयोग नहीं मिल पाता है। इस व्यवस्था को बदलने की जरूरत है, आबकारी विभाग का एक समान व्यवहार सभी व्यवसाइयों के प्रति होना चाहिए।

कमल जोशी 

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