अच्छा खासा वक्त कटा और अच्छा खासा खेल रहा…..!

बात उन दिनों की है जब मयकशी से यारी नहीं हुई थी
दोस्ती बस किताबों से ही थी…
पीने की महफिल से वास्ता घर में ही पड़ गया था  पिताश्री (से.रा. यात्री) के दोस्तों की लंबी फेहरिस्त थी पीने पिलाने वालों की उनमें से एक थे रघुनाथ शर्मा जी  पेशे से एडवोकेट और उर्दू अदब के बड़े कदरदान रात की महफिल में रघुनाथ जी का कोई सानी नहीं था उनका एक भाई एयर इंडिया में काम करता था लिहाजा शाम की महफिल के लिए उनके पास एक से एक नायाब ब्रांड हुआ करते थे.

अगरचे मयकशी से यारी का किस्सा कुछ यूं है… कि एक शाम शर्मा जी जॉनी वॉकर के साथ टू इन वन (टेप रिकॉर्डर और रिकॉर्ड प्लेयर) लेकर हाजिर हुए
उस शाम के बाद जब भी महफिल जमती मेहंदी हसन और गुलाम अली की गजलों के रिकॉर्ड बजते क्या आवाज़ और अंदाज़ था अदायगी का
कमबख्त बिना पिए ही नशा हो जाए महफिल उजड़ने के बाद एक रात मैंने टेप रिकॉर्डर चलाने की कोशिश की तो एक नज़्म रूबरू आ खड़ी हुई
साहिर लुधियानवी की तो एक-एक लाइन के हम बड़े कद्रदान थे  यह नज़्म पहली बार सुनी थी

“महफिल से उठ जाने वालों
तुम लोगों पर क्या इल्जाम
तुम आबाद घरों के वासी
मैं आवारा और बदनाम
मेरे साथी, मेरे साथी, मेरे साथी खाली जाम
मेरे साथी, खाली जाम…”
क्या बात कही मियां साहिर साहब ने भी …
मयकशों की महफिल भले ही खत्म हो गई थी लेकिन साहिर साहब के साथ अपनी महफिल उसी रात शुरू हो गई
नज़्म को दोबारा सुना गया
तिबारा सना गया
बार बार सुना गया
“… दो दिन तुमने प्यार जताया
दो दिन तुमसे मेल रहा
अच्छा खासा वक्त कटा
और अच्छा खासा खेल रहा
अब खेल का जिक्र ही कैसा
वक्त कटा और खेल तमाम
मेरे साथी, मेरे साथी, खाली जाम…”
हम भी उन दिनों नाकाम मोहब्बत की पहली चोट खाए आशिक थे
हमें लगा कि यह आवाज टेप रिकॉर्डर से नहीं आ रही बल्कि हमारे भीतर से आ रही है
उनकी (अब नाम क्या बताना, थी एक सहकर्मी) दिल्लगी अच्छा खासा खेल रही …

साहिर साहब की बात कुछ कुछ समझ में आ रही थी 30 साल से ज्यादा हो गए मयकशी से यारी हुए लेकिन साहिर साहब की आत्मा के साथ पहली मयकशी ड्राइंग रूम की टेबल पर खाली जाम की सूरत में आज भी मौजूद महसूस होती है.

अलोक यात्री 

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