चुम्मा पीठ महंत!

जवान होते हुए एक दिन ऐसा आता है जब चुंबन जैविक मजबूरी की लजीली हद फलांग कर खुद को जाहिर करने के तरीके में बदल जाता है. तब दीवार, किताब का पन्ना, किसी की दाढ़ी, पेड़ की छाल कुछ भी चूमा जा सकता है. प्रेम के अनंत रुपों की समझदारी से जो आत्मविश्वास हासिल होता है उसकी इसमें अहम भूमिका होती है. और आत्मविश्वास…उसे बनाने और खत्म करने में शराब की जो ईश्वर जैसी भूमिका है उसके बारे में क्या कहा जाए! लोग उन शराबियों की आदाएं खूब जानते हैं जो शाम को बादशाह अकबर का हाथी खरीदा करते हैं और सुबह माफी मांग लेते हैं. एक बार शत्रुघ्न सिन्हा ने इस रहस्य के बारे में बात करते हुए मुझसे एक सूत्र कहा था- “रात गई, बात गई, बदनाम हुआ सुभाष घई.”

यह नखलऊ की ऐसी ही एक रात का किस्सा है.

मेरा एक दोस्त है अनेहस शाश्वत जो कभी कभार पीने के साथ उम्दा बातचीत में यकीन रखता है. पिछली सदी की बात है, हम दोनों बेरोजगारी उर्फ घुटन की एक शाम उम्दा बातचीत की गरज से जॉपलिंग रोड के आसपास रहने वाले एक पांडे जी के पास गए. उनके बारे में बस इतना याद है कि उनके भाई नगालैंड के पुलिस महानिदेशक  (डीजीपी) हुआ करते थे. पांडे जी को मात्रा के लिहाज से अपने युग के महान शराबी अशर्फीलाल यादव से मिलने जाना था. उन्होंने शाश्वत के साथ मुझे भी अपनी गाड़ी में बिठा लिया.

अशर्फीलाल जी रेलवे के अफसर (शायद इंजीनियर) थे जो चारबाग के पीछे राजा फतेहअली के तलाब में मेंहदी और मोरपंखी की घनी झाड़ियों से घिरे, झूलेदार लॉन वाले एक छोटे से बंगले में रहते थे. एक कमरे में उनसे ओहदे में नीचे के पांच-सात आदमी पीते हुए हंसी ठट्ठा कर रहे थे. हम लोग भी एक एक गिलास थाम कर बैठ लिए जो गहराई में भरपूर और पकड़ में भरोसेमंद थे. कमरे की नंगी पीली दीवारों, कुर्सियों से लेकर पानी के मग्गे, खाने की प्लेटों और रम के पैग बनाने के ढंग तक कहीं भी, किसी तरह की नफासत का इशारा नहीं था बल्कि सबकुछ जाने क्यों उस आवेगमय सौंदर्य की प्रतीक्षा में ठिठका हुआ लगता था जो शराब और मन के मेल से ही पैदा होता है. डेढ़- दो घंटे बाद पीने वाले एक एक कर उठ कर जाने लगे.

उस परिदृश्य में देखने लायक बड़ी आंखों वाले गहरे रंग के अशर्फीलाल ही थे. उनके गिर्द आबनूसी चमक का वलय था. वे बुर्राक सफेद लुंगी और बनियान में साढ़े छह फीट ऊंचे, सुगठित होने की उम्र के इस पार भी शक्ति का आभास देते फैलाव की अध्यक्षता करते हुए भव्य लग रहे थे. उनके सिर पर घने सफेद बालों का मुकुट सजा हुआ था. हो सकता है उनके बारे में पांडे जी ने रास्ते में जो बताया था उसका असर हो, वे मुझे ऐसे सम्राट लग रहे थे जिसके अयोग्य और ‘मीडियॉकर’ दरबारी एक के बाद एक अपनी देहभाषा में घर पर इंतजार करती बीबी और कल समय से दफ्तर जाने जैसे अनकहे बहाने बनाते हुए उठकर जा रहे हों. उनकी आंखों में उस सूनी रात की तस्वीर थी जो अब उन्हें अकेले बैठकर पीते हुए काटनी पड़ेगी. थोड़ी देर इधर उधर की बातें करने के बाद मेरे मुंह से निकला, “आइए पीने का कम्पटीशन करते हैं!”

उन्होंने पहली बार मुझे ढंग से देखा, “आपकी उम्र कम है, कम पीना चाहिए.”

उम्र के आधार पर दी जाने वाली धौंस मुझे मंजूर नहीं थी. कोई बेटा कह दे तो आग लग जाया करती थी. लगता था रिश्ते की आड़ में छिपकर मुझसे कुछ छीनने की साजिश की जा रही है. मैने कहा, ” आज जो हारेगा, लिखकर सर्टिफिकेट देना पड़ेगा.”

पांडे जी बीचबचाव करने आए लेकिन अब कोई उनकी सुनने लायक नहीं रह गया था.

शाश्वत को मजा आ रहा था. मैं अक्सर उसके पैसे झपट कर पी लिया करता था. तब उसे भी पीनी पड़ती थी. वह आज मुझे जी भर पीते देखना चाहता था. खैर पी तो पहले से ही रहे थे लेकिन अब पीने का मुकाबला शुरू हुआ. थोड़ी देर बाद अचानक लगता कि गिलास में उंगली घुस गई है. चौंक कर देखता कि गिलास और उंगली अपनी-अपनी जगह हैं. बातचीत का एक टुकड़ा या कोई एक शब्द सुनाई देता. बाकी बात उड़कर कहां जा रही है अंदाजा नहीं लगने पाता था. सिर में नींद की जुड़वां बहन जैसी कोई भारी चीज बहुत मुलायमियत से लुढ़क रही थी जो कभी सिर को पीछे झटक देती कभी नीचे झुका देती. बाथरूम जाने के लिए चप्पल पहनने की कोशिश विफल जीवन का रुपक लगने लगी. पैर दाएं-बाएं-ऊपर से निकल जा रहा था. सजगता और हैरानी दोनों कोई मदद नहीं कर पा रहे थे. एक क्षण लगता हम लोग एक भयानक रात के भीतर हैं दूसरे ही क्षण ख्याल आता आदमी ने कब का रात को बिजली खिलाकर पालतू बना लिया है. अंततः ‘गो हाथ को जुंबिश नहीं आंखों में तो दम है’ की अवस्था के आसपास मैने अठारहवां या उन्नीसवां पैग बनाने की जिद की तो उन्होंने कहा, “बहुत टाइम हो गया, अब बस करते हैं.”

“तो आप हार गए?”

“यही समझ लीजिए. तभी तो कह रहा हूं कि अब उठा जाय.”

“नहीं…नहीं…ऐसे नहीं माना जाएगा. कागज पर सर्टिफिकेट लिखिए.”

अशर्फीलाल ने घर के भीतर आवाज लगाकर किसी से कागज और कलम मंगाया. यह किसी स्कूली बच्चे की कॉपी थी और ढक्कन चबाया हुआ पेन था. उन्होंने प्रसन्नता से, नीचे की ओर भागती लेकिन सधी लिखावट में दर्ज किया- I was defeated in the game of whisky by Anil Yadav.

वे कमरे के बाहर तक हम लोगों को छोड़ने के लिए आए. मैने आखिरी बार सफेद बालों के मुकुट से सजी, मुस्कराती आंखों वाली भव्य आकृति को देखा और लिपट कर चूम लिया. हुआ यह था कि उनके ऊंचे कद के कारण मुझे उछलना पड़ा, पूरे वजन से झूल जाने के कारण वे घबरा गए और जोर से अस्पष्ट आवाज में चिल्लाने पड़े. उनकी पत्नी और बच्चे घर के भीतर से धड़धड़ाते हुए बाहर निकले और हमें इस हालत में देखकर हतप्रभ रह गए. एक क्षण की बदहवासी के बाद जब सभी हंसने लगे, लगातार हंसते ही जा रहे थे तो वे हैरानी से देखते हुए वापस लौट गए.

रास्ते में गाड़ी की खिड़की से शहर रोशनी का फड़फड़ाता पर्दा लग रहा था जिसमें एक भी प्रिंट साफ नहीं था. शाश्वत बुदबुदाया, “यादव से यादव मिले कीन्हों चुम्मा चंट.”

यह अद्भुत पंक्ति थी जिसे कई दिनों तक मौज का रंदा मारकर, अलग-अलग मनःस्थितियों में उच्चारित करते हुए, उस शाम की याद में एक कविता के रुप में विकसित किया गया-

यादव से यादव मिले

कीन्हों चुम्मा चंट

हे यादव! तुम कौन हो

मैं चुम्मा पीठ महंत.

हे यादव, अब आप कहें

मैं वृद्ध बिना नख-दंत!

मैने सर्टिफिकेट को एक सुंदर से फ्रेम में मढ़वा लिया लेकिन उसे दीवार पर टांग नहीं पाया क्योंकि जिद के जवाब में अशर्फीलाल की हंसती आंखे याद आ जाती थीं. दूसरे वह ‘गेम आफ व्हिस्की’ के बारे में था जबकि हम लोग तो रम पी रहे थे.     

अनिल यादव
हिंदी के वरिष्ठ लेखक और पत्रकार

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