भारत शराब का तीसरा बड़ा बाजार, 30 फीसदी लोग पीते हैं यहां

विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2005 से 2016 के बीच भारत में प्रति व्यक्ति शराब की खपत दोगुनी से भी ज्यादा हो गई। वर्ष 2005 में देश में जहां प्रति व्यक्ति अल्कोहल की खपत 2.4 लीटर थी, वहीं 2016 में यह खपत बढ़ कर 5.7 लीटर तक पहुंच गई। संगठन का कहना है कि भारत में कुल आबादी के लगभग 30 फीसदी लोग शराब पीते है। इनमें से चार से 13 फीसदी लोग ऐसे हैं जो रोजाना शराब पीते हैं।

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि शराब के कुप्रभाव से हिंसा, मानसिक बीमारियों और घायल होने की समस्याएं बढ़ी हैं। इतना ही नहीं कैंसर व ब्रेन स्ट्रोक जैसी बीमारियों की चपेट में आने वाले लोगों की तादाद भी अल्कोहल के कारण बढ़ी है। स्वस्थ समाज के विकसित होने की राह में सबसे गंभीर खतरा बनती शराब की समस्या पर अंकुश लगाने की दिशा में ठोस पहल करने की सिफारिश इस रिपोर्ट में की गई है।

ये रिपोर्ट बताती है कि शराब के अधिक मात्रा में सेवन से कम से कम 200 तरह की बीमारियां होने की संभावना होती है। ज्यादा शराब पीने वाले लोगों में टीबी, एचआईवी और निमोनिया जैसी बीमारियों के संक्रमण का खतरा जरूरत से अधिक बढ़ जाता है। इस रिपोर्ट का आशय है कि शराब के सेवन की बढ़ती प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने और 2010 से 2025 के बीच इसकी वैश्विक खपत में 10 फीसदी की कटौती का लक्ष्य हासिल करने के लिए ठोस कदम उठाया जाना जरूरी हो गया है। लोगों का जीवन बचाने के लिए शराब पर टैक्स लगाने के लिए रचनात्मक तरीकों पर विचार करना जरूरी है।

दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बाजार

भारत दुनिया में शराब का तीसरा सबसे बड़ा बाजार है। यहां शराब उद्योग सबसे तेजी से फलने फूलने वाले उद्योगों में शामिल हो चुका है। इस उद्योग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि युवा तबके में शराब का चलन तेजी से बढ़ रहा है। कई क्षेत्रों में युवकों को शुरुआती नौकरियों में मिलने वाली बढ़िया तन्ख्वाह और तेजी से विकसित होती पब संस्कृति ने इस उद्योग का भविष्य अच्छा बना दिया है।

दूसरी तरफ बाजार का अर्थशास्त्र बताता है कि शराब के विभिन्न ब्रांडों की कीमतें बढ़ने के बावजूद न तो उनकी मांग कम होती है और न ही लोग पीना कम करते हैं। उल्टे लोग कम कीमत वाले दूसरे ब्रांड इस्तेमाल करने लगते हैं। बेंगलुरू, हैदराबाद, पुणे और गुरुग्राम जैसे शहरों में आईटी उद्योग में आने वाली क्रांति और बेहतर वेतन भत्तों से अब सप्ताह में पांच दिनों की हाड़ तोड़ मेहनत के बाद वीकेंड के दो दिन वे अपने मित्रों के साथ इन पैसों को पबों या बार में उड़ाने का फैशन चल पड़ा है। हाल ही में भारत में शायद इसी कारण शराब निर्माता कंपनियों की भी बाढ़-सी आ गई है। सूत्र बताते हैं कि देश में शराब की खपत बढ़ने की मुख्यतः दो वजहें हैं, जागरूकता की कमी और उपलब्धता। पढ़ाई, नौकरी या छुट्टियां मनाने के लिए अब हर साल लाखों भारतीय विदेश जा रहे हैं। वहां उनको आसानी से शराब की नई नई किस्मों की जानकारी मिलती है। इसके अलावा अब हर गली-मोहल्ले में ऐसी दर्जनों दुकानें खुलती जा रही हैं जहां आसानी से उपलब्ध होने और कीमतों के लिहाज से एक बड़ी रेंज के बाजार में आने की वजह से खासकर युवकों के लिए शराब के ब्रांड का चयन करना आसान हो गया है। समाजशास्त्रियों का कहना है कि रहन सहन के स्तर में सुधार, वैश्वीकरण, आभिजत्य जीवन शैली और समाज में शराब के सेवन को अब पहले की तरह बुरी नजर से नहीं देखा जाता है।

समाज के लिए चिंताजनक

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि देश में अल्कोहल की बढ़ती खपत चिंता का विषय है। यह आदत कम उम्र में ही कई बीमारियों को न्योता देती है। इनमें मुंह व गले के कैंसर, लीवर सिरोसिस और दिल की बीमारियों की संभावना बढ़ जाती है। ज्यादा मात्रा में नियमित पीने से दिमाग को भी नुकसान पहुंचने का अंदेशा है। लंबे अरसे तक शराब पीने से पर्सनेलिटी डिसऑर्डर जैसी समस्या पैदा हो सकती है। विभिन्न सामाजिक संगठनों का कहना है कि युवाओं में पीने के खतरों के प्रति जागरूकता का भारी अभाव है। उनका कहना है कि शराब की बढ़ती खपत आगे चल कर गंभीर समस्याएं पैदा कर सकती हैं।

चीयर्स डेस्क

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