शराब व्यापारियों के आगे नहीं चल पाती पुलिस की

शराब के नाम पर ज़हर बेचने वालों के लिए इंसानी जीवन से खेलना एक खेल बन चुका है। यूपी और उत्तराखंड में जहरीली शराब से 114 लोगों की मौत कोई पहली घटना नहीं है, इससे पहले भी लोग इसी तरह मरते रहे हैं लेकिन मौत के सौदागरों का खेल बंद नहीं होता है।  यूपी की राजधानी लखनऊ से पंद्रह किलोमीटर की दूरी पर मलिहाबाद में 13 जनवरी 2012 को कच्ची शराब बनाए जाने की सूचना पर पुलिस ने घोला गांव में बेहता नाले के किनारे जंगलों मे छापेमारी की। शराब व कारोबारी तो मिले नहीं, पुलिस को देख मची भागदौड़ में गांव के कल्लू की बेहता नाले में गिरकर मौत हो गई। इस मामले ने इतना तूल पकड़ लिया कि कल्लू की मौत के लिए बीट सिपाहियों को जिम्मेदार ठहराते हुए उन पर हत्या और एससीएसटी एक्ट का मुकदमा दर्ज कर दिया गया। आखिरकार जांच में साबित हुआ कि कल्लू शराब कारोबारी था।

इसी साल की बात है लखनऊ जिले के औलिया खेड़ा गांव में कच्ची शराब बनाने वालों को पकड़ने पहुंची पुलिस को ग्रामीणों के जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ा था। शराब कारोबार से जुड़ी महिलाओं ने पुलिस पर हमला बोल दिया था और पथराव करके उन्हें गांव से बाहर खदेड़ दिया था। इतना ही नहीं, बाद में इन महिलाओं ने कुछ पुलिस कर्मियों पर गम्भीर आरोप लगाते हुए सड़क जाम कर प्रदर्शन भी किया था। नतीजतन पुलिस को मुंह की खानी पड़ी और उस बार भी शराब के व्यापारी कार्रवाई से बच निकले।  जहरीली शराब की ताज़ा घटना, जिसमें 114 लोगों की मौत हो चुकी है, इस घटना के बाद चले अभियान में बहराइच और रायबरेली में पुलिस ने दबिश डाली, कई लोगों को गिरफ्तार किया। दो लोगों की मौत हो गई, इसके नतीजे में बहराइच में आरोपी चैकी इंचार्ज समेत तीन को निलंबित कर दिया गया। रायबरेली में पिटाई की जांच एसडीएम ऊंचाहार कर रहे हैं।

ये घटनाएं लखनऊ जनपद की हैं, अंदाजा लगाया जा सकता है कि यूपी के दूसरे शहरों में कच्ची शराब बनाने वालों का कितना जबर्दस्त प्रभाव है। जाहिर है कि ये प्रभाव किसी राजनीतिक रसूख के बिना नहीं आता होगा। यह भी जगजाहिर है कि इस प्रकार का असर और रसूख जिला प्रशासन में बैठे अधिकारियों के भ्रष्टाचार के बिना भी नहीं आ सकता। लेकिन दूसरा पक्ष ये है कि जब कोई घटना घट जाती है तो निगाहें कार्रवाई के लिए पुलिस की तरफ ही उठती हैं जिसका मनोबल सबसे पहले तोड़ दिया गया होता है। मलिहाबाद और औलिया खेड़ा की घटनाओं का उल्लेख ये बताने के लिए काफी है कि पुलिस कैसे और क्या कर पाने की स्थिति में होती है।

इसी कारण ये धंघा कभी मंदा नहीं होता और 2012 की उन घटनाओं के बाद 11 जनवरी 2015 का दतली गांव के जुगनू द्वारा तैयार की गयी शराब पीने से लखनऊ और उन्नाव जिले के करीब 58 लोगों की जान चली गई। इस घटना के बाद उच्च स्तरीय अभियान चला तो दर्जनों कारोबारी जेल भेजे गये। कुछ दिनों तक सब सामान्य रहा मगर अब घोला, औलिया खेड़ा, रामनगर, मोहज्जीपुर जैसे गांवां में यह कारोबार फिर से पनप रहा है। कच्ची शराब बनाने वाले लोगों का रूझान इस कारोबार से कम नहीं हो पा रहा है। इसके पीछे बेरोजगारी का भी बहुत महत्वपूर्ण योगदान है कि लोग मेहनत मजदूरी करने की बजाए शराब बनाने और बेचने जैसे काम करते हैं । आंकड़ों की अपनी अलग दुनिया है, यहां बताया जा रहा है कि वर्ष 2018-19 में कच्ची शराब बनाने और बेचने वाले 75 लोगों को जेल भेजा गया और 54 मुकदमें पंजीकृत किए जा चुके हैं।

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