ख़राब है ज़हरीली शराब से मरने वालों के प्रति रवैय्या

यूपी और उत्तराखंड में जहरीली शराब से 114 लोगों की मौत हो गई और सब कुछ सामान्य रहा, हां उन गरीब ग्रामीणों के घरों में जरूर कोहराम मच गया जिनके घरों से अर्थियां उठीं। अगर किसी दैवीय आपदा में इन दो राज्यों में 114 लोग मर गए होते तो 24 घंटे के चैनलों पर कितना कवरेज होता। सरकार क्या कुछ नहीं करती। एनडीआरएफ की कितनी टीमों को लगा दिया जाता और रेस्क्यू पर कितना जोर होता। अगर साम्प्रदायिक दंगों में तीन चार दिन में 114 लोग मर गए होते तो दोनों राज्यों की सरकारों के लिए कितना बड़ा संकट खड़ा हो चुका होता। रैपिड एक्शन फोर्स की कितनी बटालियनों को लगाया जाता, कितना रिलीफ किया गया होता। लेकिन चूंकि ये 114 लोग जहरीली शराब पीकर मरे हैं तो किसी पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा है।

क्यों, क्या जहरीली शराब इसीलिए बनाई जा रही है कि लोग इसी तरह मरें और पीने वालों के लिए प्रेरणा स्रोत बनें। समाज की कोई सहानुभूति शराब पीकर मरने वाले के प्रति नहीं होती है। आखिर उस व्यक्ति का क्या दोष होता है जो गरीबी के कारण हंड्रेड पाइपर के बजाए कच्ची पीने पर मजबूर है, और कौन नहीं मजबूर है मिलावटी खाद्य पदार्थां को खाने से जिसको खाने से हर वर्ष लाखों लोग कैंसर के शिकार होते जा रहे हैं। सिगरेट और गुटखे के निर्माता क्या इसीलिए इसे तैयार करते हैं कि लोग कैंसर के शिकार हो जाएं।

पाॅलीथीन के प्रति सरकार अगर इतनी सख्ती दिखा सकती है तो शराब के प्रति क्यों नहीं, क्यों नहीं सरकार गुटखे पर प्रतिबंध लगाती है। दोहरे मानदंडों वाले हमारे समाज की सरकारें भी अनजाने में ही दोहरेपन का शिकार हो जाती हैं। जहरीली शराब के कारोबार में कौन लोग शामिल हैं, किससे छुपा है। जिला प्रशासन से लेकर राजनीतिज्ञ तक इस मामले में अपनी अपनी स्थानीय मजबूरियों से इस धंघे के अपरोक्ष रूप से जुड़े प्रतीत होते हैं।

आम जन जीवन में पाॅलीथीन के इस्तेमाल, सिगरेट और गुटखे के प्रयोग और मिलावटी खाद्य पदार्थों का इस्तेमाल जहरीली शराब के इस्तेमाल से अलग सही, लेकिन जैसे इन पदार्थों के इस्तेमाल से होने वाले कैंसर रोगी से सहानुभूति की जा सकती है तो कच्ची शराब के नाम पर जहरीली शराब पीकर मरने वाले के प्रति भी समाज उपेक्षा भाव न रखे तो सरकारें जहरीली शराब बनाने वालों पर अंकुश लगाने में जरा भी देर नहीं लगाएंगी। किसी भी मौत को अगर वह सामान्य नहीं है तो उसके प्रति रवैय्या एक जैसा रखना समाज का नही तो सरकार का कर्तव्य जरूर होना चाहिए, असामान्य मौत चाहें दंगे में हुई हो या दैवी आपदा से या जहरीली शराब पीकर हुई हो क्योकि जहरीली शराब से मरने की घटनाएं जब तब होती ही रहती हैं।

यूपी विघानसभा में प्रस्तुत किए गए सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2009 में 53 लोग जहरीली शराब से मर गए, वर्ष 2010 में जहरीली शराब का कहर 82 लोगों की मौत बनकर टूटा। वर्ष 2011 में इसी तरह 13 मरे तो 2012 में इसी तरह की पीकर 18 लोग स्वर्ग सिधार गए। साल 2013 में जहरीली शराब पीकर 52 की मौत हो गई और 2014 में पांच की। फिर 2015 में जहरीली शराब से 59 मरे और 2016 में 41 की मौत हुई जबकि पिछले साल 2017 में 18 लोग जहरीली शराब से मर गए थे।

रश्मि अस्थाना

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