चचा ग़ालिब शराब के बेहद शौक़ीन थे, ख़ूब पीते थे। शराब की हिमायत में उन्होंने दर्जनों शेर लिखे हैं। टोका टोकी होती थी तो जब तब उड़ा भी दिया करते थे कि छोड़ दी है। एक बार उनसे किसी ने पूछा कि क्या आपने वाक़ई छोड़ दी है, तो इस पर उन्होंने जवाब में कहा कि अरे, मुझे तो शराब छोड़े हुए ज़माना हो गया और सुना दिया अपना ये शेर: ग़ालिब छुटी शराब पर अब भी कभी कभी पीता हूं रोज़-ए-अब्र-ओ-शबे माहताब में यानी, ग़ालिब ने शराब तो छोड़ दी है लेकिन कभी कभी जब आसमान में बादल छाए होते हैं या जिस रात चांद निकलता है, उस रात पी लेता हूं। ग़ालिब ने इस शेर के ज़रिए बेहद शालीन मासूमियत से बता दिया कि यूं तो छोड़ दी है, लेकिन फिर भी कभी कभी पी भी लेते हैं। शेर का मतलब साफ है, अरे या तो बादल होंगे या फिर चांद निकला होगा। इस तरह रोज़ पी सकते हैं। सच तो ये है कि चचा को चाहिए रोज़ थी। छोड़ी तो उन्होंने कभी नहीं। खूबसूरत बहाने बनाते रहे इसी तरह। https://bit.ly/2URRc0t