बात 1948 की है, जालंधर के ‘हरिवल्लभ’ संगीत समारोह में भीमसेन जोशी को आमंत्रित किया गया था। यहां मशहूर सितारनवाज उस्ताद रईस खां भी थे। कार्यक्रम चल रहा था, लेकिन तलब तो तलब होती है। पंडित जी को शराब की तलब लग गई और जोशी जी एकाएक अपने दो शागिर्दों को लेकर पीने के लिए गायब हो गए। सब अचंभे में कि पंडित जी कहां गए। आयोजकों के सामने बड़ी समस्या खड़ी हो गई कि पंडाल में मौजूद 20 हजार श्रोताओं के सामने किसे पेश किया जाए। आयोजकों ने मजबूर होकर रईस खां से विनती करके उन्हें सितार बजाने के लिए राजी किया कि किसी तरह कार्यक्रम चलता रहे। उनका वादन शुरू ही हुआ था कि अचानक शोरगुल सुनाई पड़ा। खां साहब लगे रहे, यह समझ कर कि श्रोताओं पर उनके वादन का रंग चढ़ रहा है। पर इतने में स्टेज के दाएं तरफ के पैसेज से भीमसेन जोशी नजर आए। शोरगुल की वजह यही थी कि श्रोताओं ने उन्हें देख लिया था। आयोजकों को लगा कि अब अगर पंडित जी को श्रोताओं की नजर से दूर नहीं किया गया तो पंडाल में बवाल मच जाएगा। https://bit.ly/2ZQbcU7