पीने वाला शराब उपभोक्ता है, शराबी नहीं !

शराब पीने वाले जब तक डर कर पिएंगे, उन्हें शराब उपभोक्ता के रूप में मान्यता नहीं मिल सकती। शराब पीने वाले जब तक शराब पीना गुनाह समझते रहेंगे, या पाप करने की फीलिंग के साथ शराब पिएंगे, तब तक उन्हें एक जेनुइन शराब उपभोक्ता का दर्जा भला कैसे मिल सकता है। शराब पीना अगर पाप है, या डर कर शराब पी जा रही है तब तो पीने के बाद पीने वाले के साथ जो सलूक समाज करता है, या कर रहा है, वह ठीक ही है। शराब पीने वाले को गिरी हुई निगाह से देखना, उसके प्रति हिंसक और क्रूर हो जाना, उसे समाज की मुख्य धारा से ही बाहर कर देना, उसके साथ अमानवीय सलूक करना आम बात है।

शराब पीने वाला इस सामाजिक व्यवहार के खिलाफ अगर विरोध करता है तो उसकी बात इसीलिए नहीं सुनी जाती है क्योंकि अभी तक पीने वाले के मन से ये डर नहीं निकला है कि वो कोई गलत काम कर रहा है। शराब पीने वाला व्यक्ति वास्तव में शराब उपभोक्ता है। लेकिन उसने खुद भी शायद ही कभी अपने आपको शराब उपभोक्ता कहलाना पसंद किया हो। शायरों, कवियों, फिल्मी गीतों की बनाई छवि से शराब उपभोक्ता निकलना ही नहीं चाहता। वह उन शब्दों में घिर गया है जो उसे समाज में ग्लैमर से भरे दिखते हैं। हालांकि यही शब्द हैं जो जरा सा मामला बिगड़ने पर गाली बन जाते हैं।

शराब उपभोक्ता की पहचान, शराब उपभोक्ता की न होकर शराबी, पियक्कड़, पीने वाला और न जाने क्या क्या बनी हुई है। क्या किसी भी शराब उपभोक्ता ने इस छवि को तोड़ने की कोशिश की। नहीं, इसलिए कि अभी तक भारत में, विशेष रूप से उत्तर भारत में शराब पीने वाले लोग जैसे शराब के नशे में मस्त हो जाते हैं वैसे ही उन शब्दों में भी मस्त रहते हैं। अगर शराब उपभोक्ता, जो पहले से ही जागरूक है, अपनी ये झिझक तोड़ दे कि वह वास्तव में अन्य उपभोक्ताओं की तरह ही एक उपभोक्ता है तो उसे समाज में वह इज़्ज़त मिलने लगेगी जिसका वह हकदार है। थोड़ा समय लग सकता है, लेकिन अपना अधिकार लेने की पहल होगी तो वह अधिकार जरूर मिलेगा।

लेकिन ऐसा होता दिख नहीं रहा है क्योंकि शराब उपभोक्ता गिल्ट में जीता है, उसे शाम को अच्छा लगता है, रात को अच्छा लगता है, लेकिन अधिकांश शराब उपभोक्ता दिन में उसी शराब को खराब बताते हैं जो हर शाम या रात को उनका मजबूत सहारा बनती है। इस पाखंड से निकले बिना किसी भी शराब पीने वाले को शराब उपभोक्ता के रूप में सामाजिक मान्यता नहीं मिल सकती। हालांकि कानूनी रूप से वो शराब उपभोक्ता है, लेकिन चूंकि सामाजिक मान्यता नहीं है, इसलिए कानून भी उसका साथ नहीं देता है। तोड़नी होगी ये जड़ता और निकलना होगा इस पाखंड से। अगर शराब पीना है, तो उसे वही सम्मान देना होगा जिसकी वह हकदार है।

उन लोगों की बात किए बिना, उन लोगों का उदाहरण दिए बिना जो पीकर झूमते हुए मिलते हैं। घरों में मारपीट करते हैं, शराब को छेड़छाड़ का बहाना बना लेते हैं, शराब को बदनाम करते हैं। ये सब हमेशा चलेगा, इसे रोका नहीं जा सकता, क्योंकि हर क्षेत्र में यही होता है। सिर्फ शराब के मामले में ही सबकी नजरों से गिर जाना किसी भी शराब उपभोक्ता की मजबूरी नहीं। झिझक तोड़नी जरूरी है, दोहरे मापदंड और पाखंड से निकलना जरूरी है।

सुहेल वहीद

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