सुदर्शन फ़ाकिर का नाकाम इश्क़

हंगामा है क्यों बरपा, थोड़ी-सी जो .... .

मेरा अब तक चोरी-छिपे पीने का ही अनुभव था, यानी दो-चार घूूँट में ही गिलास खाली करने का, मगर यहां का दस्तूर एकदम अलहिदा था। यहां लोग कतरा-कतरा पीते थे। किसी को किसी का डर नहीं था, जैसे कह रहे हों कि हंगामा है क्यों बरपा, थोड़ी-सी जो पी ली है! डाका तो नहीं डाला, चोरी तो नहीं की है। लोग एक पेग पीने में इतना समय लगा देते कि मुझे बहुत कोफ़्त होती। धीर-धीरे मैं संस्कारित होने लगा। कहने का मतलब यह कि मैं भी काले साहबों की तरह धीरे-धीरे घूँट भरना सीख गया, बिलियर्ड भी खेलने लगा और यहाँ तो ’रीडर्स डायजेस्ट‘ के ताजे़ अंक पर विचार-विमर्श भी करना पड़ता। मुझे यह ज़िन्दगी बहुत मस्नूई लग रही थी। इन लोगों के लिए रीडर्स डायजेस्ट, टाइम्स, लाइफ, न्यूज़वीक आदि पत्रिकाएँ ही ‘सरस्वती‘ थी, ‘विशालभारत‘ था, ‘निकर्ष‘ था। ये लोग सामन्तों और अँग्रेज़ों के विलासपूर्ण जीवन के क़िस्से चटखारे लेकर सुनाया करते थे। राजकुमारों, राजकुमारियों, अँग्रेज़ अफ़सरों और उनकी प्रमिकाओं की अदृश्य छाया मेज़ों के आसपास मँडराती रहती। काॅलिज में जब कोई छात्रा बताती कि उसके बड़े भाई या पिता मुझसे क्लब में मिले थे तो मैं इस वाक्य का निहितार्थ समझने की कोशिश करता। जैन दम्पती से भी कई लोगों ने मेरे बारे में जानकारी हासिल की थी। मुझे मालूम था कि मै इस दुनिया का बाशिन्दा नहीं हूँ, मैं अपनी फकीर मंडली में ज़्यादा मुक्त और आज़ाद महसूस करता था। क्लब में दारू के अलावा मेरा किसी भी क्रिया अथवा बातचीत में मन न लगता। क्लब में देर हो जाती तो कभी-कभी जैन दम्पती के यहाँ रूक जाता। उनकी जीवन-शैली पश्चिम पद्धति से प्रभावित थी। घर लौटते ही जैन साहब नाइट सूट पहन लेते और श्रीमती जैन नाइटी और हाउस कोट। मैं उन्हीं कपड़ों में सो जाता। उनके यहाँ सुबह-सुबह चाय भी रेस्तराँ की तरह ही परोसी जाती। नाश्ते में वे लोग बटर टोस्ट खाते और मुसम्बी का रस पीते, जबकि मैं नास्ते में भरवाँ पराँठा खाने वाला इंसान था। टोस्ट वग़ैरह से मेरा पेट ही न भरता। छुरी काँटे से मुझे उलझन होती, हँसी भी आती। जालन्धर लौटकर मैं चैन की साँस लेता।

सुदर्शन फ़ाकिर का नाकाम इश्क़काॅलिज में मेरा मन लगता था मेरी कक्षा में सब छात्राएँ उपस्थित रहतीं। मैं खू़ब चटख़ारेदार लेक्चर देता। मैं बहुत जल्द सीख गया कि लड़कियाँ किन बातों से ख़ुश होती हैं। मैं काॅलिज के माहौल में पूरी तरह रच-बस गया था कि एक दिन खबर लगी कि ‘डेपुटेशन‘ पर नेपाल गया हिन्दी प्राध्यापक वापस लौट आया है। छह महीने का समय जैसे चुटकियों में बीत गया था। कॉलिज में छोटा- सा विदाई समारोह हुआ और मेरी छुट्टी हो गयी। कुछ लड़कियाँ दुपट्टे से आँसू पोंछ रही थी, हो सकता है मेरे प्यार में पड़ गयी हों। बाद में कुछ लड़कियों ने जाने कैसे जालन्धर में मेरी बहन से दोस्ती कर ली और घर आने-जाने लगीं, मगर मैं घर में बैठता ही कब था!

मैं अपनी दुनिया में लौट आया था। मेरे दोस्तों को मेरी नौकरी छूटने का बहुत सदमा लगा, क्योंकि यारों के बीच मैं ही एकमात्र कमाऊ दोस्त था। सबको मालूम था, मेरा जलवा भी मेरी नौकरी की तरह अस्थायी है। मैं अपनी बेरोज़गार चैकड़ी के बीच सही-सलामत लौट आया था। मेरी शख़्सीयत का कोई ख़ास क्षरण नहीं हुआ था। कपूरथला से विदाई लेकर मैं घर नहीं गया, सीधा सुदर्शन फ़ाकिर के कमरे को सीढ़ियाँ चढ़ गया और सन्तरे का एक पेग पीकर नौकरी के ‘हैंग-ओवर‘ से मुक्त हो गया।

फ़ाकिर का कमरा एक मुसाफ़िरखाने की तरह था। सुदर्शन फ़ाकिर इश्क़ में नाकाम होकर सदा के लिए फ़ीरोजपुर छोड़कर जालन्धर चला आया था और उसने एम.ए. (राजनीति शास्त्र) में दाखि़ला ले लिया था। बाद में, बहुत बाद में अपने अन्तिम समय में बेगम अख़्तर ने फ़ाकिर की ही सबसे अधिक ग़ज़लें गायीं। उसकी एक ग़ज़ल ‘हम तो समझे थे बरसात में बरसेगी शराब, आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया‘ ग़ज़ल प्रेमियों में बहुत लोकप्रिय हुई। बेग़म जब पाकिस्तान गयीं तो फ़ैज अहमद ‘फ़ैज‘ ने फ़ाकिर की लिखी हुई ठुमरी ‘देखा देखी बलम होई जाये‘ उनसे दसियों बार सुनी थी। मगर मैं तो उस फ़ाकिर की बात कर रहा हूँ, जो इश्क़ में नाकाम होकर जालन्धर चला आया था और शायरी और शराब में आकंठ डूब गया था। जालन्धर आकर वह फ़कीरों की तरह रहने लगा। उसने दाढ़ी बढ़ा ली थी और शायरों का लिबास पहन लिया था। उसका कमरा भी देखने लायक़ था। एक बड़ा हाॅलनुमा कमरा था, उसमें फर्नीचर के नाम पर सिर्फ़ दरी बिछी हुई थी। बीच-बीच में कई जगह दरी सिगरेट से जली हुई थीं। अलग-अलग आकार की शराब की ख़ाली बोलतें पूरे कमरे में बिखरी पड़ी थीं, पूरा कमरा जैसे ऐशट्रे में तब्दील हो गया था। फ़ाकिर का कोई शगिर्द हफ़्ते में एकाध बार झाडू लगा देता था। कमरे के ठीक नीचे एक ढाबा था। कोई भी घंटी बजाकर कुछ भी मँगवा सकता था। देखते-देखते फ़ाकिर का यह दौलतख़ाना पंजाब के उर्दू, हिन्दी और पंजाबी लेखकों का मरकज़ बन गया। अगर कोई काॅफी हाउस में न मिलता तो यहाँ अवश्य मिल जाता। दिन भर चाय के दौर चलते और मूँगफली का नाश्ता। अव्वल तो फ़ाकिर को एकान्त नहीं मिलता था, मिलता तो ‘दीवाने ग़ालिब‘ में रखे अपनी प्रेमिका के विवाह के निमन्त्रण-पत्र को टकटकी लगाकर घूरता रहता। इस एक पत्र ने उसकी ज़िन्दगी का रुख़ पलट दिया था।

फ़ाकिर का यह चैम्बर पंजाब की साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का स्नायु केन्द्र था। विभाजन के बाद जालन्धर ही पंजाब की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में विकसित हुआ था। आकाशवाणी और दूरदर्शन के केन्द्रों के अलावा पंजाब में हिन्दी के समाचार-पत्र केवल जालन्धर से प्रकाशित होते थे। पंजाब विश्वविद्यालय का हिन्दी विभाग भी जालन्धर में ही था। शास्त्रीय संगीत का वार्षिक कार्यक्रम हरिवल्लभ भी जालन्धर में आज तक आयोजित होता है। आकाशवाणी के कार्यक्रमों के सिलसिले में हिन्दी, पंजाबी अथवा उर्दू का कोई रचनाकार जालन्धर आता तो वह फ़ाकिर के कमरे में चरणामृत प्राप्त करने ज़रूर चला आता। चैबारे के नीचे ही होटल था। चाय, भोजन की अहर्निश व्यवस्था रहती। फ़ाकिर का कमरा रेलवे रोड पर था, रात भर कोई-न-कोई ढाबा अवश्य खुला रहता। फ़ाकिर के होटल का बिल ही काफ़ी हो जाता होगा, मगर उसके चेहरे पर मेहमान को देखकर कभी शिक़न नहीं आयी। मैंने कभी किसी होटल या ढाबे वाले को उसके यहाँ पैसे के लिए हुज़्ज़त करते नहीं देखा था।

राकेश जी चले गये थे, मगर कॉफी हाउस आबाद था। हिन्दी, उर्दू और पंजाबी के कवियों-कथाकारों का अच्छा-ख़ासा जमावड़ा लगा रहता। राष्ट्रीय स्तर पर केवल राकेश जी की पहचान बन पायी थी, बाक़ी लोग अभी रियाज़ कर रहे थे यानी संघर्ष कर रहे थे। उन दिनों साथी लेखकों, कलाकारों में कुमार विकल, सुदर्शन फ़ाकिर, कृष्ण अदीब, सत्यपाल आनन्द, नरेश कुमार ‘शाद‘, प्रेम बारबटनी, रवीन्द्र रवि, जसवन्त सिंह विरदी, मीशा, सुरेश सेठ, जगजीत सिंह (सुप्रसिद्ध ग़ज़ल गायक) हमदम आदि लोग उल्लेखनीय हैं। फ़ाकिर के चैबारे के अलावा हम लोगों का एक और ठिकाना था। वह था कलाकार हमदम का ग़रीबख़ाना। हमदम का हृदय फ़ाकिर की ही तरह विशाल था, मगर उसके साधन सीमित थे। चाय वग़ैरह का प्याऊ उसके यहाँ भी चलता था। हमदम का कमरा भी फ़ाकिर के कमरे का प्रतिरूप था। वह सिविल लाइन्स में एक कमरा लेकर रहता था। वह एक शॉपिंग कॉम्पलेक्स की पहली मंज़िल पर रहता था, कम्पनी बाग़ और कॉफी हाउस के नज़दीक। कॉफी हाउस में कोई न मिलता तो लोग हमदम के कमरे में चले आते। हमदम सूफी आदमी था, यानी दारू नहीं पीता था, सिगरेट नहीं छूता था, मगर गिलास और बर्फ़ उपलब्ध करा देता था। वह पेंटर था। साइन बोर्ड लिखकर गुजारा चलाता था। लेखकों, कवियों के सम्पर्क में आया तो पुस्तकों के डस्ट कवर भी बनाने लगा। वह ज़्यादा पढ़ा-लिखा नहीं था, मगर पिकासो की कला पर विचार व्यक्त कर सकता था। वह इस दुनिया में निपट अकेला था। माँ-बाप नहीं थे, एक बहन थी, बहन की शादी के बाद से उससे भी उसका कोई सम्पर्क न था। दोस्त अहबाब ही उसकी दुनिया थे। वह आधुनिक चित्रकला पर अधिक-से-अधिक जानकारी हासिल करता रहता था। हुसेन का नाम सबसे पहलेे मैंने उसी से सुना था। बाद में दिल्ली के कई नामी कलाकारों के बीच वह उठने-बैठने लगा था। इन्दरजीत के बाद वह ‘शमा‘ का कलाकार भी नियुक्त हो गया था। जालन्धर में उसका कमरा साहित्य, संस्कृति और कला का दूसरा उपकेन्द्र था। दिन भर जिन गिलासों से नीचे होटल से चाय आती थी, वह शाम तक जाम में तबदील हो जाते। हमदम हमेशा क़र्ज में डूबा रहता था। सच तो यह है, वह कर्ज़ में जीने का आदी हो चुका था। वह किसी का पैसा दबाना भी नहीं चाहता था, मगर कोई ढाबे वाला बत्तमीज़ी से तकाज़ा करता तो वह उसे पीट भी देता।

उन दिनों जालन्धर में ऐसा वातावरण था कि हम लोग साहित्य में ही जीते थे। साहित्य पढ़ते, सुनते और ओढ़ते। हमारे लिए मनोरंजन और जीवन का यही एक साधन और उद्देश्य था। शे‘र सुनते, कहानी पर बातचीत करते, माक्र्सवाद और अस्तित्ववाद की गुत्थियाँ सुलझाते। कहानियाँ लिखते और नामी पत्रिकाओं में प्रकाशनार्थ भेजते। रचनाएँ सधन्यवाद लौट आतीं, हम सम्पादकों की बुद्धि पर तरस खाते और अपनी रचनाएँ दैनिक पत्रों में छपवाकर आह भर लेते, ज़्यादा-से-ज़्यादा आकाशवाणी पर प्रसारित कर आते।

(रवीन्द्र कालिया)

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