सप्लाई का पानी साफ हो भी तो कैसे, इस्तेमाल हो रही 100 साल पुरानी तकनीक

वैसे तो लखनऊ यूपी की राजधानी है लेकिन यहाँ सप्लाई होने वाले पानी की गुणवक्ता इतनी ख़राब कि भारतीय मानक ब्यूरो ने भी इसे लेकर सवाल उठाए हैं । इससे भी चौंकाने वाली बात ये है कि गोमती के पानी को पीने लायक बनाने के लिए आज भी सौ साल पुरानी पारंपरिक तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह बताने की जरूरत नहीं कि गोमती देश की सबसे प्रदूषित नदियों में हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि आखिर शहरवासी किस गुणवत्ता का पानी पी रहे हैं? ऐसे में यदि लखनऊ के पानी को भारतीय मानक ब्यूरो ने पीने लायक नहीं बताया है तो क्या गलत है।

जलकल विभाग द्वारा हर रोज ऐशबाग से 225 एमएलडी, बालागंज से 100 व गोमती नगर तीसरे जलकल से 80 एमएलडी पानी की आपूर्ति की जाती है। गोमती से लिए गए कच्चे पानी को पारंपरिक विधि से शोधन के बाद घरों में आपूर्ति की जाती है। मुश्किल यह है कि गोमती से जलापूर्ति के लिए ‘सीओ’ ग्रेड की गुणवत्ता का पानी चाहिए होता है, लेकिन बरसात के चंद दिन छोड़ दें तो पूरे साल नदी जल की गुणवत्ता सही नहीं मिलती। ऐसे में पारंपरिक शोधन तकनीक से नदी जल को पीने योग्य बनाना असंभव है।

पारंपरिक शोधन नहीं रहा कारगर
गोमती जल में रसायनों के साथ-साथ भारी धातुओं की पुष्टि हो चुकी है। ऐसे में केवल पारंपरिक विधि से किए गए शोधन से पानी कतई पीने योग्य नहीं बनता। जलकल अभियंता बताते हैं कि गोमती के पानी का शोधन करने के लिए कोऑगुलेशन, फ्लोक्यूलेशन, सेगमेंटेशन, फिल्ट्रेशन व क्लोरीनेशन किया जाता है। इससे पानी में तैरने वाली अशुद्धियां अलग हो जाती हैं और क्लोरीनेशन व ब्लीचिंग से पानी विसंक्रमित हो जाता है, लेकिन इस प्रोसेस में जल में मौजूद केमिकल व भारी धातुओं का उपचार नहीं होता।
चीयर्स डेस्क 
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