शराब से आमदनी, शराब से नफरत…कौन आगे !

शराब से होने वाली मौतों ने शराब के खिलाफ माहौल तैयार करने में अहम भूमिका निभाई है। हाल ही में असम, कुशीनगर और सहारनपुर में जहरीली शराब पीने से करीब ढाई सौ लोगों की मौत हो गई। जाहिर है कि शराब के खिलाफ प्रदर्शन हुए। ज्यादा दिन नहीं हुए हैं जब बिहार को शराब मुक्त घोषित कर दिया गया। उसके बाद केरल में भी शराब पर पाबंदी लगा दी। लक्ष्यद्वीप, मणिपुर और नागालैंड की सरकारें पहले ही अपने यहां शराब पर प्रतिबंध लगा चुकी हैं।

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उत्तराखंड में शराब पर प्रतिबंध की मांग काफी अरसे से चल रही है। जाहिर है कि शराब पर पाबंदी लगाने का दबाव सरकारें झेल रही हैं। तमिलनाडु में स्वर्गीय जयललिता ने भी शराब पर पाबंदी लगाने की बात कही थी। गुजरात शुरु से ही शराब मुक्त है।

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एक स्वाभाविक सवाल है कि क्या शराब पर पाबंदी लगा देने से राज्य शराब मुक्त हो जाता है या फिर ये भी एक राजनीतिक मुद्दा बन गया है। वास्तविकता जो भी हो, पर शराब बंदी एक राजनीतिक हथियार बनता जा रहा है, चुनावी वादों में शराब बंदी भी शामिल होती जा रही है। दूसरी तरफ भारत का विदेशी शराब का बाजार दिन दूनी रात चैगनी तरक्की करता जा रहा है।

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यूपी सरकार तो सबसे अधिक राजस्व शराब से ही वसूलती है। राजस्व का लालच ऐसा है कि सरकारें शराब पर पाबंदी नहीं लगा पा रही हैं। गुजरात, बिहार, केरल आदि में गैर कानूनी रूप से शराब मिल जाती है, इससे कोई इनकार नहीं करता। तो क्या फिर शराब पर पाबंदी सरकार के लिए घाटे का सौदा है। अगर यही हालात रहे और शराब सेवन के प्रति समाज में जागरूकता नहीं पैदा हुई तो शराब केवल सम्पन्न और सामाजिक रूप से सक्षम लोगों तक ही सीमित रह जाएगी।

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अंतरराष्ट्रीय रिसर्च संस्था यूरो मॉनिटर की रिपोर्ट में बताया गया है कि शराब पर बढ़ते टैक्स ने इसकी बिक्री कम की है। लेकिन तथ्य यह भी है कि रोज शराब पीने वालों की तादाद बढ़ती जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार व्हिस्की, रम और ब्रांडी की बिक्री में गिरावट आई है जबकि स्कॉच, वोदका और वाइन की खरीदारी बढ़ रही है।

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हालांकि लखनऊ शराब एसोसिएशन के महामंत्री कन्हैया लाल मौर्या इससे सहमत नहीं हैं। उनके अनुसार समाज की 75 प्रतिशत आबादी किसी न किसी रूप में शराब का सेवन करती है। उनके मुताबिक आने वाले दिन शराब व्यवसाय के लिए बहुत अच्छे हैं क्योंकि शराब को लेकर सामाजिक मिथक और युवकों की झिझक टूट रही है।

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यूपी में वर्ष 2019-20 में शराब से 29,300 करोड़ रुपए का राजस्व प्राप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। सरकारी लाइसेंस लिए यूपी में 27 हजार 24 शराब की दुकानें हैं, इनमें 14,000 देशी शराब की हैं। 1994 में यूपी सरकार ने शराब की मॉडल शॉप का लाइसेंस देना शुरू किया। कन्हैया लाल मौर्या के मुताबिक इन 401 आधुनिक मयखानों से सांस्कृतिक बदलाव आया। लोग इत्मीनान से यहां पीते हैं और घर जाते हैं। इन मयखानों के खुलने के बाद से सड़कों पर लहराने और नाली में गिरने की घटनाएं कम हुई हैं।

चीयर्स डेस्क

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