शराब नहीं पीने के नियम को किया जाए कड़ाई से लागू

मद्रास उच्च न्यायालय ने राज्य परिवहन निगमों के प्रबंध निदेशकों को निर्देश दिया है कि वे सवारी बस के चालकों को सेवाकाल खासकर वाहन चलाते वक्त शराब पीने से रोकने के नियम की कड़ाई से पालना कराएं। न्यायाधीश डी. कृष्णकुमार ने इस सिलसिले में मूल याचिका पर सुनवाई को एक सप्ताह के लिए टालते हुए महानगर परिवहन निगम के प्रबंध निदेशक के शपथपत्र को स्वीकार कर लिया। यह शपथ पत्र एमटीसी द्वारा चालकों को ड्यूटी अवर्स में शराब नहीं पीने के नियमन से जुड़ा था।

शपथ पत्र में न्यायालय को सूचित किया गया कि एमटीसी की हर बस में यात्रियों की सुविधा के लिए संबंधित डिपो के प्रबंधक का नम्बर है जिस पर संपर्क करने पर तत्काल दूसरे चालक को भेजने की व्यवस्था की जाती है। बस आगार से जब चालक रवाना होता है तो प्रवेश द्वार पर सुरक्षा गार्ड ब्रीथ एनेलाइजर किट के माध्यम से इनका परीक्षण करता है। शराब के नशे में होने पर चालक को बस नहीं ले जाने दी जाती है। सभी बसें स्टैंड से निकलती है जहां चालक व कंडक्टर को टाइम कीपर के समक्ष दस्तखत करने होते हैं जो रजिस्टर का अनुरक्षण करता है।

यह रिट याचिका एमटीसी प्रबंधन ने अपर श्रम न्यायालय के पीठासीन अधिकारी तृतीय द्वारा शराब का सेवन करने वाले चालक की बर्खास्तगी के आदेश को निरस्त करने पर चुनौती देते हुए दायर की गई थी। मामले के अनुसार जी. कन्नभिराम १० अप्रेल १९८९ को बतौर चालक नियुक्त हुआ और वह तिरुवत्तीयूर बस डिपो से जुड़ी बस चलाता था। २१ दिसम्बर १९८९ को शराब के नशे में वह बस नहीं चला सका और सभी यात्रियों को राजा कड़ै बस स्टॉप पर उतार दिया। इससे न केवल राजस्व की क्षति हुई बल्कि जनता में एमटीसी की छवि भी बदनाम हुई।

उसके खिलाफ ऐसी कई शिकायतें थी। फिर निर्धारित प्रक्रिया की पालना करते हुए चालक कन्नभिरान को सेवा से बर्खास्त किया गया। उसने औद्योगिक विवाद मामले के तहत इसे अपर श्रम न्यायालय में चुनौती दी और उसके पक्ष में फैसला आया जिस पर एमटीसी ने हाईकोर्ट में अपील की। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायाधीश डी. कृष्णकुमार ने एमटीसी प्रबंधन को निर्देश दिया था कि वह शराब के नशे में वाहन चालन को रोकने संबंधी किए गए उपायों की जानकारी हाईकोर्ट को उपलब्ध कराए।

चीयर्स डेस्क 

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