शराब के शौकीन याहया खान ने जब जंग गंवा दी

भारतीय सेना के अदम्य साहस, बहादुरी और बलिदान से भारत ने पाकिस्तान को 1971 में जबर्दस्त मात दे दी थी। भारत पाक का वह युद्ध निर्णायक साबित हुआ और पूर्वी पाकिस्तान को भारत ने आजाद कराकर बांग्लादेश का निर्माण करा दिया। लेकिन इस युद्ध में यहिया खान की अय्याशी का भी बड़ा दखल था। तीन दिसंबर, 1971 की दोपहर को जैसे ही जनरल याहया खान अपनी जीप से वायुसेना हेडक्वार्टर्स जाने के लिए चले, एक बहुत बड़ा गिद्ध उनकी जीप के सामने आ कर बैठ गया।

रेहान फज़ल लिखते हैं कि याहया के बगल में बैठे जनरल हामिद ने धीरे धीरे जीप बढ़ानी शुरू की, लेकिन गिद्ध ने हिलने का नाम नहीं लिया। उन्होंने हॉर्न बजाया, लेकिन गिद्ध ने उतनी ही हिकारत से उन्हें घूरा। याहया ने भी जीप से कूद कर अपने बेंत से उसे भगाने की कोशिश की, लेकिन गिद्ध टस से मस नहीं हुआ।माजरा देख कर पास काम कर रहा माली दौड़ता हुआ आया और उसने बहुत मुश्किल से अपने फावड़े से गिद्ध को याहया के रास्ते से हटाया।
बाद में उस समय याहया खान के एडीसी अर्शद समी खान ने अपनी आत्मकथा ‘थ्री प्रेसिडेंट्स एंड एन एड‘ में लिखा, ‘‘मैं अंधविश्वासी नहीं हूँ, लेकिन 3 दिसंबर, 1971 की दोपहर का वो दृश्य बार बार मेरी आँखों के सामने कौंधता है जब एक गिद्ध ने जनरल याहया खान की जीप का रास्ता रोक लिया था, मानो कोई ऊपरी ताकत उन्हें बताने की कोशिश कर रही हो कि युद्ध पर जाने का फैसला सही फैसला नहीं है।‘‘

रंगीले याहया खान
याहया खान हालांकि फारसी बोलने वाले पठान थे, लेकिन वो बहुत अच्छी पंजाबी भी बोल लेते थे। वो हाजिर जवाब शख्स थे और उनका सेंस ऑफ ह्यूमर बहुत अच्छा था। वो न तो इस बात का दावा करते थे कि वो बहुत बड़े बुद्धिजीवी थे और न ही वास्तव में वो ऐसे थे।
पाकिस्तान के शासकों पर किताब पाकिस्तान एट द हेल्म लिखने वाले तिलक देवेशर बताते हैं, याहया खान एक तो बहुत रंगीले आदमी थे। उनको शराब पीने का भी बहुत शौक था। अधिक शराब पीने से जो अवगुण किसी शख्स में आ सकते हैं वो सब उनमें मौजूद थे। उनका स्तर एक डिवीजनल कमांडर का था। उससे ऊपर उन्हें नहीं जाना चाहिए था।

तिलक देवेशर बताते हैं, जब जनरल मूसा रिटायर हुए तो अयूब ने तीन जनरलों को सुपरसीड कर उन्हें सेनाध्यक्ष बनाया था। मूसा ने कहा भी था कि याहिया सैनिक रूप से तो ठीक हैं, लेकिन उनकी जो दूसरी गतिविधियाँ हैं, उसकी वजह से वो सेनाध्यक्ष नहीं बन सकते। जब अयूब खान ने कहा था कि तुम उसकी फिक्र मत करो, वो अपने को संभाल लेंगे।

अयूब ने उन्हें इसलिए चुना क्योंकि उन्हें लगा कि वो उनके लिए खतरा नहीं होंगे। उनकी बौद्धिक क्षमता भी ऐसी नहीं थी कि वो भुट्टो और मुजीब को डील कर पाते। याहिया खुद भी कहा करते थे कि मैं अपने आप को सरलता और धर्मनिष्ठा के नमूने के तौर पर नहीं दिखाना चाहता। एक पापी शख्स के तौर पर मेरे निजी चरित्र में कई खोट हैं जिसके लिए मैं अल्लाह से माफी चाहता हूं।

रात का आदेश
याहया खान शराब पीने के लिए इतने बदनाम थे कि सैनिक कमांडरों को निर्देश दिए गए थे कि वो उनके ऐसे किसी मौखिक आदेश का पालन न करें जो रात के 10 बजे के बाद दिए गए हो।तिलक देवेशर बताते हैं, सब को मालूम था कि याहया शाम आठ बजे से शराब पीना शुरू कर देते थे और 10 बजे तक काबू से बाहर हो जाते थे। पाकिस्तान के चीफ ऑफ द स्टाफ जनरल अब्दुल हमीद खान ने राज्यों के आला सैनिक अधिकारियों को ताकीद कर रखी थी कि रात दस 10 के बाद दिए गए राष्ट्रपति के मौखिक आदेशों का तभी पालन किया जाए जब अगले दिन वो खुद उसकी पुष्टि राष्ट्रपति कार्यालय से कर लें।
मिलिट्री चेन ऑफ कमांड में आपका प्रेसिडेंट हुकुम दे रहा है और वरिष्ठ सैन्य अधिकारी कह रहे हैं कि हुकुम मत मानो, क्योंकि पता नहीं किस हालत में आपने हुकुम दिया हैं।

हाउस वार्मिंग पार्टी
हसन अब्बास अपनी किताब पाकिस्तान्स ड्रिफ्ट इन टू एक्सट्रीमिज्म में याहया की अय्याशी का उदाहरण देते हुए लिखते हैं, 1971 में पाकिस्तान के सरेंडर से कुछ दिन पहले याहया ने पेशावर में बने अपने नए घर पर एक हाउस वार्मिंग पार्टी दी। बुलाए गए मेहमानों में से एक थीं एक बंगाली महिला श्रीमती शमीम जिन्हें ब्लैक पर्ल के नाम से जाना जाता था।

याहया ने उनको ऑस्ट्रिया में पाकिस्तान का राजदूत भी नियुक्त किया था। जैसे जैसे पार्टी परवान चढ़ती गई, लोगों ने शराब के नशे में अपने कपड़े उतारने शुरू कर दिए। एक समय ऐसा आया कि सभी लोग बिना कपड़ों के थे, सिवाए याहया के सैनिक सचिव मेजर जनरल इशाक के। तभी ब्लैक पर्ल ने इच्छा प्रकट की कि वो अपने घर जाना चाहेंगी। याहया ने जोर दिया कि वो उसी हालत में उन्हें खुद ड्राइव करके उन्हें उनके घर छोड़ने जाएंगे।जनरल इशाक पाकिस्तान को तो नहीं बचा पाए, लेकिन उन्होंने पाकिस्तान के राष्ट्रपति के मन में इतनी सद्बुद्धि भर दी कि वो बाहर निकलने से पहले अपनी पैंट पहन लें।

छत्तीस का आंकड़ा
याहया को इंदिरा गांधी से सख्त नफरत थी। निजी जिंदगी में वो उन्हें दैट वूमैन यानी वो औरत कह कर पुकारते थे। पाकिस्तान के विदेश सचिव रहे सुल्तान मोहम्मद खान अपनी आत्मकथा मेमोरीज एंड रेफ्लेक्शन्स ऑफ अ पाकिस्तानी डिप्लोमैट में लिखते हैं, जब याहया की रूस यात्रा के दौरान रूस के राष्ट्रपति पोडगोर्नी ने जोर दे कर कहा कि आपको इंदिरा गाँधी से मिलना ही होगा तो याहया ने साफ शब्दों में जवाब दिया कि कोई भी मुझे इस बैठक के लिए बाध्य नहीं कर सकता।

वो आगे लिखते हैं, पोडगोर्नी ने मेज पर हाथ मारते हुए दोहराया, आप दोनों को मिलना ही होगा। इस पर याहया खान ने मेज पर इतनी जोर से हाथ मारा कि बगल में रखे वाइन के ग्लास से छलक कर शराब की कुछ बूंदें मेज पर गिर गईं। याहिया बोले, मैं भारत की प्रधानमंत्री से किसी भी हालत में मिलने के लिए तैयार नहीं हूं।इसके बाद पूरे कमरे में सन्नाटा सा छा गया। थोड़ी देर बाद दोनों तरफ के राजनयिकों ने महसूस किया कि बात बिगड़ रही है। उन्होंने तुरंत एक दूसरे के लिए जाम उठा कर बात को संभाला।

साधारण आई क्यू
अमरीका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के मन में याहया खान के लिए बहुत सॉफ्ट कॉर्नर था, लेकिन उनके विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर पर याहया कोई खास असर नहीं डाल पाए थे। किसिंजर अपनी आत्मकथा द वाइट हाउस इयर्स में लिखते हैं, मैंने निक्सन को बताया कि याहया और उनकी टीम को ऊँचे आई क्यू के लिए कोई पुरस्कार नहीं दिया जा सकता।

वो हमारे लिए वफादार हैं, स्पष्टवादी भी हैं, लेकिन उनमें ये समझने की बौद्धिक क्षमता ही नहीं है कि क्यों पूर्वी पाकिस्तान को पश्चिमी पाकिस्तान का हिस्सा नहीं होना चाहिए। उन्हें इस बात का अंदाजा ही नहीं था कि भारत युद्ध की तैयारी कर रहा है। और अगर इसका थोड़ा बहुत अंदाजा उनको था भी तो उन्हें ये खुशफहमी थी कि जीत उनकी ही होगी।

मैंने दबी जुबान से उनसे पूछने की कोशिश भी की कि आप भारत के संख्या में अधिक सैनिकों और हथियारों का सामना कैसे करेंगे? उनका जवाब था कि मुस्लिम सैनिक भारतीय सैनिकों से बेहतर लड़ाका हैं।उस दिन याहया शराब के नशे में हर मेहमान के पास जा कर पूछ रहे थे, क्या मैं आपको डिक्टेटर दिखाई देता हूँ? जब उन्होंने मुझसे भी यही सवाल किया तो मैंने जवाब दिया, मुझे पता नहीं राष्ट्रपति महोदय, लेकिन आप अगर डिक्टेटर हैं भी, तो आपको पता ही नहीं था कि चुनाव किस तरह लड़वाया जाता है।

लेडीज मैन
याहया खान को लेडीज मैन कहा जाता था। कई महिलाओं के साथ उनकी दोस्ती थी। उनकी सबसे नजदीक महिला दोस्त थीं अक्लीम अख्तर जो जनरल रानी के नाम से मशहूर थीं।मलका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ को याहया नूरी कह कर पुकारते थे। वो भी याहया को सरकार कह कर बुलाती थीं। महिलाओं के साथ उनके संबंधों को ले कर एक बार बहुत बड़ी प्रोटोकॉल समस्या उठ खड़ी हुई थी।

एक जमाने में पाकिस्तान में बीबीसी के संवाददाता रहे ओवेन बेनेट जोंस अपनी किताब पाकिस्तान आई ऑफ द स्टॉर्म में लिखते हैं, एक बार ईरान के शाह पाकिस्तान के सरकारी दौरे पर वहाँ पहुंचे। जब उनके लौटने का समय आया तो उन्हें देर होने लगी क्योंकि याहिया अपने शयनकक्ष से बाहर ही नहीं निकल रहे थे।अंतत उनकी नजदीकी दोस्त जनरल रानी को मनाया गया कि वो उनके बेडरूम में जा कर उन्हें बाहर लाएं। जब वो अंदर घुसीं तो उन्होंने उन्हें अपने बिस्तर पर पाकिस्तान की एक मशहूर गायिका के साथ पाया।

तोहफे देने के शौकीन
याहया के मानवीय पक्ष के बारे में बहुत कम लोगों को पता है। उन्हें तोहफे देने का बहुत शौक था। और हां, इसके लिए वो सरकारी पैसे के बजाए अपना खुद का पैसा खर्च करते थे।अर्शद समी खाँ ने मुझे बताया था, जैसे ही याहया राष्ट्रपति बने, उन्होंने मुझे निर्देश दिए कि मैं हमेशा अपने साथ कुछ उपहार तैयार रखूँ जिन्हें वो स्थानीय और विदेशी मेहमान को दे सकें।

एक बार बेगम याहया की एक दोस्त ढाका से मिलने उनके पास आईं। वो उनके साथ राष्ट्रपति भवन के दालान में बैठ कर चाय पी रही थीं। तभी याहया गोल्फ खेल कर वापस लौटे। बेगम याहया ने उनसे फारसी में कहा, आज मेरी दोस्त का जन्मदिन है। याहया बोले, मैं आपको तोहफे में क्या दे सकता हूँ? उस महिला ने बहुत सकुचाते हुए कहा, अगर आप तोहफा देने के लिए इतना जोर दे रहे हैं, तो अपनी इस्तेमाल की हुई कोई चीज मुझे दे दीजिए।
याहया ने कहा, इस समय तो मेरे पास ये गोल्फ टी शर्ट, पैंट और जूते हैं। ये चीजे किसी महिला को नहीं दी जा सकतीं। मेरे पास एक टावल रुमाल भी है जो मेरे पसीने से भरा हुआ है। हाँ एक चीज है मेरे पास आपके लिए। आप अपनी आँखें बंद करें और अपना हाथ मेरी तरफ बढ़ाएं। उस महिला ने अपनी आँखें बंद कीं और झिझकते हुए याहया की तरफ अपना हाथ आगे बढ़ा दिया।

याहिया ने अपने हाथ से सोने की ओएस्टर रोलेक्स घड़ी उतारी और उस महिला की कलाई में पहना दी। आँखें खोलते ही उस महिला ने विरोध करते हुए कहा, मैं तो आपसे एक रुमाल की उम्मीद कर रही थी। ये तो बहुत मंहगी चीज है। आप इसे वापस ले लीजिए। याहया हंसते हुए बोले, एक बार दिए जाने के बाद तोहफा वापस नहीं लिया जाता।

मौका गंवाया
एक सैनिक अधिकारी के रूप में याहया ने कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया- इंस्ट्रक्टर, स्टाफ कॉलेज, क्वेटा, डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशन, डिवीजन कमांडर और चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ।मैंने तिलक देवेशर से पूछा कि आप एक सैनिक कमांडर के रूप में याहया खान को किस तरह आंकते हैं? देवेशर का जवाब था, देखिए उनका सैनिक करियर बहुत अच्छा था, लेकिन हर आदमी के जीवन में एक समय आता है उनकी परीक्षा लेने का।
याहया के सामने ये मौका आया 2 सितंबर, 1965 को, जब उन्हें अखनूर पर हमला करने का कमांड दिया गया। पहले कोई और डिविजनल कमांडर थे।

उनकी जगह याहया को कमांडर बनाया गया। अखनूर सिर्फ 10 किलोमीटर की दूरी पर था। पाकिस्तानी सेनाएं आगे बढ़ रही थीं।
ग्रैंड स्लैम योजना का मुख्य बिंदु ही यही था कि पाकिस्तानी सेना जोरियाँ को बाई पास कर सीधे अखनूर की तरफ जाए। क्योंकि एक बार अखनूर गिर जाता है तो भारतीय सेनाओं का कश्मीर का रास्ता कट जाएगा। लेकिन जब याहया खान को ये मौका मिला तो उन्होंने कहा कि मैं पहले अखनूर पर हमला नहीं करूंगा, पहले जोरियाँ पर कब्जा करूंगा।इसकी वजह से भारतीय सेना को 36 घंटे मिल गए और उन्होंने अखनूर का रक्षण मजबूत कर लिया। पाकिस्तानी अखनूर को नहीं ले पाए और ग्रैंड स्लैम प्लान वहीं तहस-नहस हो गया।

निक्सन से बात
13 दिसंबर, 1971 तक ये बिल्कुल स्पष्ट हो गया था कि पाकिस्तान पूर्वी मोर्चे पर बुरी तरह पिछड़ रहा है। जब चीन से मदद की सारी उम्मीदें खत्म हो गईं तो याहया ने मजबूरन अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को फोन मिलाया।अर्शद समी खान अपनी किताब थ्री प्रेसिडेंट एंड एन एड में लिखते हैं, याहया ने जब निक्सन को फोन किया तो वो किसी मीटिंग में थे। 13, दिसंबर 1971 की रात 02 बजे राष्ट्रपति भवन के टेलीफोन ऑपरेटर ने मुझे फोन किया कि राष्ट्रपति निक्सन लाइन पर हैं। मैंने इंटरकॉम से फोन कर याहया को जगाया।

अर्शद समी खान आगे अपनी किताब में लिखते हैं, नींद में चूर याहया ने फोन उठाया। लाइन बहुत खराब थी। इसलिए याहया ने मुझसे कहा कि मैं दूसरी लाइन पर सारी बातें सुनूँ और अगर लाइन टूट जाए तो निक्सन से बात करना जारी रखूँ।निक्सन की बातों का लब्बोलुआब था कि वो पाकिस्तान की सुरक्षा के लिए बहुत चिंतित हैं और उन्होंने उसकी मदद के लिए सातवाँ बेड़ा बंगाल की खाड़ी में भेज दिया है। जैसे ही निक्सन ने फोन रखा, याहिया ने मुझसे कहा कि मैं जनरल हमीद को तुरंत फोन लगाऊ। जैसे ही हमीद ने फोन उठाया याहया लगभग चिल्लाते हुए बोले, हैव डन इट. अमेरिकंस आर ऑन देयर वे।

अमरीकी बेड़ा अगले दिन तो दूर ढाका के गिरने तक बंगाल की खाड़ी में नहीं पहुंचा। इस हार के लिए याहया की थ्योरी कि पूर्व की रक्षा पश्चिम से होगी को जिम्मेदार ठहराया गया।तिलक देवेशर बताते हैं, ये वास्तव में अयूब खान की रक्षा रणनीति थी। उनका मानना था कि हमारी फौज इतनी बड़ी नहीं है। अगर सेना को दो हिस्सो में बांट दिया गया और पाकिस्तान के दोनों हिस्सों में बराबर बराबर तैनात किया गया, तो कोई भी हिस्सा भारत के हमले को सह नहीं पाएगा और भारत को वॉक ओवर मिल जाएगा।अगर भारत पूर्व में हमला करेगा तो हम पश्चिम में उस पर जवाबी हमला बोलेंगे। जब पूर्वी पाकिस्तान गिर गया तो याहया ने कहा कि हम युद्ध विराम करेंगे। नियाजी लड़ना चाहते थे, लेकिन याहया ने कहा कि इससे पश्चिमी पाकिस्तान खतरे में पड़ जाएगा..

1971 के असली विलेन
कई साल पहले जब मैंने जनरल नियाजी से संपर्क किया तो उन्होंने भी 1971 की हार का ठीकरा जनरल याहया के सिर पर ही फोड़ा। उन्होंने कहा, अल्लाह गारत करे याहया को कि हमने जीती हुई बाजी हार दी। ये शिकस्त मगरिब में थी और लानत हम पर पड़ी। मैं जब लड़ रहा ता मैंने 13 तारीख को हुक्म दिया, आखरिी गोली आखरिी आदमी। ये हुक्म फौज के लिए मौत का वारंट होता है। मगरबी (पश्चिम) पाकिस्तान वालों को लगा कि ये लड़ाई तो लंबी होगी। वो मगरबी (पश्चिम) पाकिस्तान पर हुकूमत करना चाहते थे। 13 तारीख को उनका हुकुम आया, स्टॉप फाइटिंग एंड सरेंडर। इस तरह मगरबी (पश्चिम) पाकिस्तान को बचाने के लिए हमें मशरकी (पूर्व) पाकिस्तान देना पड़ा।

हार की खबर
दिलचस्प बात ये है कि इस हार की खबर पाकिस्तानी लोगों को ऑल इंडिया रेडियो से मिली। रेडियो पाकिस्तान ने उस दिन अपने शाम 5 बजे के समाचार बुलेटिन में कहा, भारत और पाकिस्तान के कमांडरों के बीच सहमति के बाद पूर्वी क्षेत्र में लड़ाई रुक गई है और भारतीय सैनिकों ने ढाका में प्रवेश कर लिया है।उस दिन याहया ने देश को संबोधित जरूर किया, लेकिन उसमें हार का कोई जिक्र नहीं था। याहया बोले, इतनी बड़ी जंग में किसी एक महाज पर वक्ती तौर पर पीछे हटने का ये मतलब हरगिज नहीं है कि लड़ाई खत्म हो चुकी है. भारत के साथ लड़ाई जारी रहेगी। इंशा अल्लाह आखरिी फतह हमारी ही होगी…  तिलक देवेशर कहते हैं, पाकिस्तान का प्रापगैंडा हमेशा झूठ पर मबनी था- 1965 में भी और 1971 में भी। लोगों को बताया गया था कि पाकिस्तानी सेनाएं जमीन, आसमान और समंदर में हर जगह फतह पर फतह पा रही हैं।

15 दिसंबर तक यही कहानी चली। लेकिन जब वो सरेंडर करने लगे तो उनके सामने समस्या आई कि लोगों को क्या बताया जाए। पहले तो उन्होंने अपने लोगों को बताया ही नहीं। फिर याहया ने देश को संबोधित किया और कहा कि हम लड़ना जारी रखेंगे…. याहया के शासन काल का सबसे अच्छा आकलन सत्तर के दशक में पाकिस्तान के विदेश सचिव रहे सुल्तान मोहम्मद खान ने अपनी आत्मकथा मेमोरीज एंड रेफ्लेक्शन्स ऑफ अ पाकिस्तानी डिप्लोमैट में किया हैं।सुल्तान लिखते हैं, याहया ये विश्वास करने के लिए कतई तैयार नहीं थे कि भारत पूर्वी पाकिस्तान में हस्तक्षेप भी कर सकता है। उस समय पाकिस्तानी सेना के जनरलों को ये गुमान था कि वो गैर लड़ाकू बंगालियों को महज एक छर्रे के बल पर झुका देंगे।

इतिहास ने बाद में सिद्ध किया कि वो कितने गलत थे। इस लड़ाई के बाद पाकिस्तान का आकार आधा रह गया। उन्हें बहुत शर्मिंदगी उठानी पड़ी और उस मानसिक आघात से उबरने में उन्हें बहुत समय लगा। एक राष्ट्रपति के रूप में एक बिखरी हुई आबादी का नेतृत्व करने की काबलियत उनमें नहीं थी। अनैतिक राजनीतिज्ञों से निपटने और विश्व राजनीति के दांवपेचों को समझने की उनकी क्षमता भी बहुत सीमित थी।

जुल्फिकार अली भुट्टो के सत्ता में आने के बाद याहया को खारियाँ के पास बन्नी के एक रेस्ट हाउस में नजरबंद कर दिया गया। उन्हें किसी दोस्त या रिश्तेदार से मिलने की इजाजत नहीं थी।रेस्ट हाउस में मक्खियों, मच्छरों और सांपों का बोलबाला था। वहाँ कुछ समय के लिए ही पानी आता था और अक्सर बिजली चली जाती थी। भुट्टो के सत्ता से हटने के बाद जिआउल हक ने उन्हे नजरबंदी से मुक्त किया। 10 अगस्त, 1980 को जनरल याहया खान का देहावसान हो गया।

रेहान फज़ल

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