शराब और हरी पत्तेदार सब्जियों से होता है माइग्रेन !

दुनियाभर में माइग्रेन के मरीजों की संख्‍या लगातार बढ़ रही है। हमारे देश में भी इसकी तादाद बढ़ती जा रही है। आमतौर पर इसका शिकार होने पर सिर के आधे हिस्से में दर्द रहता है। जबकि आधा दर्द से मुक्त होता है। जिस हिस्से में दर्द होता है, उसकी भयावह चुभन भरी पीड़ा से व्‍यक्ति ऐसा त्रस्त होता है कि सिर क्या बाकी शरीर का होना भी भूल जाता है।

ज्यादातर लोगों को भावनात्मक वजहों से माइग्रेन की समस्‍या होती है। इसीलिए जिन लोगों को हाई या लो ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और तनाव जैसी समस्याएं होती हैं उनके माइग्रेन से ग्रस्त होने की आशंका बढ़ जाती है। इसके अलावा हैंगओवर, किसी तरह का संक्रमण और शरीर में विषैले तत्वों का जमाव भी इसका कारण हो सकता है। लेकिन अमेरिका के कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के सान डीएगो के अध्ययन के प्रथम लेखक एंटोनियो गोंजालेज ने अनुसार, “कई ऐसे व्यंजन हैं, जैसे चॉकलेट, शराब और विशेष रूप से नाइट्रेट वाले खाद्य पदार्थ आदि, से माइग्रेन की शुरुआत होती है”। गोंजालेज ने पाया कि लोगों के खाने का संबंध, उनके सूक्ष्मजीवों और उनके माइग्रेन से है।

माइग्रेन से पीड़ित लोगों के मुंह में माइक्रोऑर्गेनिज़्म की संख्या ज्‍यादा होती है, जो नाइट्रेट को परिवर्तित करने की अपेक्षाकृत अधिक क्षमता रखते हैं। नाइट्रेट ऐसे खाद्य पदार्थों, जैसे प्रसंस्कृत मांस और हरे पत्तेदार सब्जियों और कुछ निश्चित दवाओं में पाया जाता है। मुंह में पाए जाने वाले जीवाणुओं से नाइट्रेट को कम किया जा सकता है। यह जब खून में संचारित होता है, तो कुछ स्थितियों के तहत नाइट्रिक ऑक्साइड में बदल जाता है। नाइट्रिक ऑक्साइड ब्‍लड सर्कुलेशन में सुधार और ब्‍लड प्रेशर को कम कर दिल की सेहत में सहायक होता है। हालांकि मोटे तौर पर चार-पांच दिल के मरीजों में जो नाइट्रेट युक्त दवाएं सीने के दर्द और हृदयाघात की दिक्कतों के लिए लेते हैं, उनमें सिरदर्द की शिकायतें एक प्रभाव के पक्ष के रूप में देखा गया है।

इसे ठीक से जानने के लिए शोधकर्ताओं ने स्वस्थ व्यक्तियों के मुंह के नमूने जीवाणु के 172 नमूने और 1,996 मल के नमूने लिए। इससे पहले प्रतिभागियों ने माइग्रेन से जुड़े सर्वेक्षण में खुद के पीड़ित होने या नहीं होने की जानकारी दी थी। जीवाणुओं के जीन अनुक्रमण में पाया कि माइग्रेन से पीड़ित और गैर माइग्रेन वाले लोगों में इनकी मात्रा अलग-अलग थी। पीड़ित लोगों में जीवाणुओं की संख्या ज्‍यादा थी। यह अध्ययन ‘एमसिस्टम्स’ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।

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