वाटर ट्रीटमेंट प्लांट बचा रहा लाखों लीटर पानी

देशभर में भूजल की समस्या तेजी से बढ़ती जा रही है, इसी को देखते हुए उत्तर रेलवे ने पानी बचाने के लिए दिल्ली के शकूरबस्ती इलाके में वेस्ट वाटर ट्रीटमेंट एंड रीसाइकिलिंग वाशिंग प्लांट की शुरुआत की है।

प्रतिदिन 6 लाख लीटर पानी की बचत
उत्तर रेलवे प्रोजेक्ट के चीफ इंजीनियर ने बताया कि इस प्लांट के जरिए प्रतिदिन 6 लाख लीटर पानी की बचत की जा रही है।  उन्होंने बताया कि यह प्लांट उत्तर रेलवे का पहला ऑटोमेटेड वेस्ट वॉटर ट्रीटमेंट एंड रीसाइकिलिंग वाशिंग प्लांट है।

उत्तर रेलवे ने की वाशिंग लाइन की शुरुआत : चीफ इंजीनियर ने बताया कि शकूरबस्ती में वाशिंग लाइन की शुरुआत की है।  उन्होंने बताया कि यहां पर पानी की कमी को देखते हुए कोचिंग टर्मिनल का काम चल रहा है।  इसी के चलते वाशिंग लाइन की शुरुआत की है, जिसमें अब ट्रीटेड वॉटर का इस्तेमाल होता है।  इस प्लांट की क्षमता रोजाना 6 लाख लीटर पानी देने की है।

डेढ़ करोड़ की लागत से बना प्लांट : चीफ इंजीनियर ने बताया कि जिस तरह से शकूरबस्ती में पानी की कमी है, उसको देखते हुए गाड़ियों को धोने के लिए वाशिंग प्लांट की शुरुआत 27 जून 2019 को की गई।  उन्होंने यह भी बताया कि इस वॉटर प्लांट की कीमत लगभग डेढ़ करोड़ रुपए है, जिसमें 5 साल का मेंटेनेंस भी शामिल है।  रोज यहां कई गाड़ियों की धुलाई होती है, जिसमें लाखों लीटर पानी धुलाई में चला जाता है।  इस प्लांट के जरिए धुलाई में इस्तेमाल पानी को वापस धुलाई के काम में उपयोग किया जा रहा है।  ट्रेनों की धुलाई के लिए 20 से 25 व्यक्ति लगातार यहां पर काम करते हैं।

एक ट्रेन की धुलाई में 40,000 लीटर पानी होता है उपयोग
वाशिंग ट्रीटमेंट प्लांट के डिप्टी चीफ इंजीनियर ने बताया कि एक ट्रेन की धुलाई में 40,000 लीटर पानी का उपयोग होता है।  इस वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट के जरिए उपयोग किए गए पानी को वापस उपयोग में लाने की कवायद यहां पर शुरू की गई है, जो बेहद कारगर साबित हो रही है।  इसके चलते प्रतिदिन लाखों लीटर पानी को बचाया जा रहा है।  उन्होंने बताया कि इस प्लांट में इस्तेमाल किए गए पानी को ही ट्रीट कर दोबारा इस्तेमाल किया जाता है. इसमें 10 फीसदी से भी कम पानी की बर्बादी होता है।  वहीं इससे निकलने वाले वेस्ट से खाद बना दिया जाता है।

फुली ऑटोमेटिक है प्लांट :  उत्तर रेलवे के प्रोजेक्ट डिप्टी चीफ इंजीनियर ने बताया कि यह प्लांट फुली ऑटोमेटिक है।  एक बार जब ट्रीट होने लायक पानी इकट्ठा हो जाता है, तब मशीन खुद ही स्टार्ट हो जाती है और आखिर में पूरा पानी ट्रीट होकर टैंक में पहुंच जाता है।  पानी को कई जगहों से टेस्ट कराया गया है और गुणवत्ता के हिसाब से रेलगाड़ी धोने के लिए ये बेहतर है।

भविष्य में पीने के लिए भी होगा इस पानी का होगा इस्तेमाल
प्लांट के चीफ इंजीनियर देश रतन ने बताया कि फिलहाल यह पानी ट्रेनों की वॉशिंग के लिए उपयोग किया जा रहा है, लेकिन आने वाले समय में इसे और ज्यादा अपडेट कर पीने के पानी के लिए भी उपयोग में लाए जाने की योजना है ताकि ट्रेनों में पीने के पानी के लिए इस पानी को इस्तेमाल किया जा सके।  उन्होंने यह भी बताया कि इस प्लांट की शुरुआत सिर्फ भूजल के कम होते स्तर को देखते हुए की गई है ताकि आने वाली पीढ़ी के लिए भी पानी को बचाया जा सके।

चीयर्स डेस्क 

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