महल में नदी या नदी में महल !

नदी पर महल, या महल में नदी इसे क्या कहा जाये – अदम्य इच्छाशक्ति, पानी से इतना प्यार, अद्भुत इंजीनियरिंग या नदी का कुछ काल के लिये कुण्ड बन जाना और फिर पुनः वही पुरानी नदी बन जाना, मानो थोड़ी देर के लिये मूड बदला है। पानी के इस सफर को देखकर आप अचम्भित रह जाएँगे! मध्य प्रदेश के ख्यात धार्मिक स्थल भगवान महाकाल की नगरी उज्जैन से 8 किलोमीटर दूर भैरवगढ़ किले के पास बना है – कालियादेह महल पानी के अद्भुत प्रबंधन की कहानी जानने के पहले यहाँ की मशहूर किंवदंती भी सुन लीजिये।

कहते हैं, यहाँ चार सौ साल पहले मांडव के सुल्तान नसरुद्दीन खिलजी ने पूर्व में निर्मित सूर्य मन्दिर को भंगकर शाही महल बनाया था। सुल्तान खिलजी को पारा खाने की आदत थी। भीतरी गर्मी को शान्त करने के लिये वे पानी में पड़े रहते थे। एक रोज नशे में चूर शिप्रा में उनकी जल-समाधि हो गई। कर्नल ल्यूअर्ड ने अपनी पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ दि सेन्ट्रल इंडिया’ में भी इस बात का उल्लेख किया है। सम्राट

अकबर ने भी इस जल महल की सुन्दरता पर मुग्ध होकर कुछ समय के लिये अपना मुकाम यहाँ किया था। वे दक्षिण को फतह करने के इरादे से यहाँ ठहरे थे और पानी संचय की इस अद्भुत प्रणाली से वे भी मंत्रमुग्ध हो गये थे। इसी पानी को पीने के लिए  भी इस्तेमाल किया जाता था  ‘अकबर-नामा’ और ‘आईने-अकबरी’ में भी इस जल महल की प्रशंसा की गई है। इसी तरह बादशाह जहाँगीर को भी यहाँ रुकना बहुत पसन्द था।

दरअसल, यह नदी का कुछ क्षेत्र के लिये और कुछ वक्त के लिये स्वरूप बदलने वाला अपने तरह का अनूठा जल प्रबंधन है। उज्जैन में बह रही शिप्रा नदी को इस प्रबंधन के पहले दो हिस्सों में बाँटा गया है। इसके एक हिस्से पर यह संरचना तैयार की गई है। कालियादेह महल में 52 पानी के कुण्ड बने हुए हैं। कोई छोटा है तो कोई बड़ा। कोई दो फीट गहरा है तो कोई 10 फीट से भी ज्यादा ये कुण्ड अत्यन्त ही सुन्दर है। इनकी सुन्दरता उस समय और बढ़ जाती है, जब शिप्रा नदी कभी एक कुण्ड में तो कभी दूसरे कुण्ड में इठलाती, मुस्कुराती, खिलखिलाती- अंखियाँ मटकाती- अपना रास्ता तय करती है। बीच में एक सर्पिल आकार की संरचना भी बनी हुई है, जिसमें पानी कभी दाहिनी ओर तो कभी बायीं ओर प्रवाहमान रहता है। ये कुण्ड सुन्दर छोटी-छोटी नालियों के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं- यानी, नदी दो पाटों के बीच न बहते हुए कुण्ड की चौकोर रचनाओं में बहती हैं।

एक कुण्ड से दूसरे कुण्ड की ओर जाने के लिये बीच-बीच में रास्ते भी बने हुए हैं। इन रास्तों में पहुँचकर जब भी कोई बीच में पहुँचता है तो वह अपने चारों ओर कुण्डों को पाता है। यह एक मनोरम दृश्य होता है। यहाँ मुख्य रूप से तीन कुण्डों का नामकरण भी किया गया है- सूर्य कुण्ड, ब्रह्म कुण्ड और अग्नि कुण्ड। यहाँ कई लोग आकर पूजा-अर्चना भी करते हैं। ऐसी मान्यता है कि यहाँ अमावस्या को कथित तौर पर बाहरी ‘बाधाओं’ से ग्रसित व्यक्ति को स्नान कराने से वह ‘मुक्त’ हो जाता है। अग्नि कुण्ड के भीतर छतरी भी बनी हुई है। पाँच कुण्ड तो किले के भीतर लम्बे हॉल बने हुए हैं। इसकी लाजवाब कारीगरी बस देखते ही बनती है।

 चीयर्स डेस्क 

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