बुंदेलखंड में पानी का महाअभियान

बुंदेलखंड के स्वयंसेवी संगठन ‘ परमार्थ’ को जल संरक्षण का पहला पुरस्कार मिलना एक दिन की मेहनत का प्रतिफल नहीं है। इसके पीछे दो दशक से जारी प्रयास निहित हैं । सौ से अधिक चंदेल कालीन तालाबों का संरक्षण आज सुपरिणाम के रूप में सामने है। इस कार्य के लिए परमार्थ ने जल सहेली, पानी पंचायत और सामुदायिक जल उपयोग योजना के मॉडल को तैयार किया, मा ही दिनों में पूरी दुनिया में बड़ी मिली है। परमार्थ के परिकल्पक संजय सिंह ने बचपन से ही सिर पर पानी से भरे दो-दो कलसे और कमर में कसहड़ी लादकर लाती महिलाओं का दर्द शिह्तत से महसूस किया।

सूखा और जल संकट की विपत्ति बरस दर बरस झेलते बुंदेलखंड का यह कही इलाका है, जहां- गगरी न फूटे चाहे खसम मरि जाए,..जैसे लोकगीत आज भी गाए जाते हैं। बालमन पर जल संकट की यह जो छाप पड़ी उसने आगे चलकर संजय को इसी में रमने और कुछ कर गुजरने के लिए प्रेरित किया और एक अनूठा जज्बा जगाया। यही नहीं, भारत में छोटी-बड़ी 83 नदियों पर जल जन जोड़ो अभियान के माध्यम से प्रयास शुरू किए गए, जिसमें बुंदेलखंड में चंद्रावल, पहुज पूर्वी उत्तर प्रदेश में आमी, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हिंडन जैसी नदियों की निर्मलता के लिए प्रयास जारी हैं। संजय कहते हैं, जल जन जोड़ो अभियान वर्तमान में पानी का सबसे बड़ा अभियान है। इस अभियान से देश भर के 6 विश्वविद्यालय, 4 आइआइटी केंद्र, 2 आइआइएम, 10 राज्यों की सरकारें जुडी हुई हैं।

उधर, दस्यु समस्या से मुकाबिल सुब्बाराव और महाराष्ट्र में पानी की समस्या को लेकर संघर्षरत अन्ना हजारे का संजय को साथ मिला तो अग्रज ने भी पारिवारिक रूप से हिम्मत बंधाई। संजय कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन को रोकने और किसानों की आर्थिक उन्नति के लिए जल संरक्षण सबसे आवश्यक है। शुरुआती दिनों में उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के करमरा गांव में जल संरक्षण का कार्य किया। मिट्टी के छोटे-छोटे बांध बनाए। दूसरी तरफ, परंपरागत ज्ञान से नदी के पानी को 100 फीट ऊपर उठाकर 2 किलोमीटर दूर ले जाकर पहली बार 100 एकड़ जमीन में सिंचाई की। इस गांव में पहली बार गेहूं का रिकार्ड उत्पादन हुआ। जिस गांव में बमुश्किल 6 माह को खाद्य सुरक्षा रहती थी वहां वर्षप्य॑त की खाद्य सुरक्षा हुईं। बस यहीं से आत्मविश्वास मजबूत हुआ कि पानी के प्रबंधन से ही आर्थिक ह्यलात में सुधारसंभव है।

1999 से लेकर 2000 तक जालौन के विकासखंड कुटौद, रामपुरा के एक दर्जन से अधिक गांव को पेयजल संकट मुक्त बनाया। पानी का सामुदायिक प्रबंधंन किया और पानी के संसाधनों के रखरखाव की जिम्मेदारी भी किसानों को दी। एक ओर गांव के क्षतिग्रस्त तालाबों की मरम्मत का कार्य किया, वहीं हैंडपंपों की स्थापना की | इस प्रयास में गांव-गांव में पेयजल एवं स्वच्छता समितियां भी बनाते गए। इन समितियों में महिलाओं ने सक्रिय सहभागिता दिखायी। जिन गांवों के 60 फीसद लोग पलायन कर जाते थे, वहां लोग वापस गांव लौटे और खेती प्रारंभ की। एक फसली क्षेत्र को दो फसली क्षेत्र में तब्दील किया।

बुंदेलखंड में सर्वाधिक समस्या जातिवाद, संसाधनों के असमान वितरण और दकियानूसी परंपराओं की है। इन सब समस्याओं के निदान के लिए बुंदेलखंड में शुरू किया महिलाओं का पानी पर प्रथम अधिकार अभियान, जिसके लिए बुंदेलखंड के 200 से अधिक गांव में पानी पंचायत बनीं और गांव-गांव में जल सहेलियों का कैडर तैयार किया गया। महिलाओं ने गांव के बेकार तालाबों को ठीक किया | चैकडेम, रिटेनिंग वॉल, कुओं का निर्माण किया। कई जगह आवश्यकता के अनुसार हैंडपंपों की स्थापना की। 900 से अधिक जल संरचनाएं बुंदेलखंड के जालौन, हमीरपुर, ललितपुर, टीकमगढ़, छतरपुर, झांसी जिले में बनाई गई हैं। इन संरचना ओं के माध्यम से 20 हजार हेक्टेयर से अधिक इलाके में सिंचाई के संसाधनों में बद्वेतरी हुई है।

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