पीने वाले की पीड़ा पीने वाला ही जानता है

बरसों पहले से उर्दू शायरी इस नतीजे पर पहुंच चुकी थी, जब शायर दर शायर ने यह बयान दिए कि असल कसूर साकी का है। कमबख्त ने ज्यादा पिला दी गुत्थी जरा नैतिक किस्म की है। फिलहाल इस समस्या का भूगोल न्यूयॉर्क है, पर उसे चौड़ाते देर क्या लगती है/ मैं कहता हूं, कल यह सवाल दिल्ली उतरेगा और छा जाएगा। बोतलें महंगी हो रही हैं, खास कर वे जो दारू से भरी हों। पीने वाले की पीड़ा पीने वाला जानता है। एक घूंट लेने के बाद वे खग हो जाते हैं और फिर खग ही खग की भाषा जानता है। भाषा भाव दर्शाती है तो वह दारू का भाव भी दर्शाएगी, जो बढ़ रहे हैं। यह दृष्टिकोण मेरा नहीं है। यह उनका है जो पॉकेट पर हाथ रख समस्याओं पर विचार करते हैं अर्थात आर्थिक पहलू पर। रुपए का मूल्य कितना गिर जाए, पर भारत के दारूपेयी रईस अभी इतने कंगाल नहीं हुए कि उन्हें बोतलें महंगी लगने लगें। और यही तेवर उस न्यूयॉर्क का है जहां एक अतिरिक्त पैग डॉलर के गम में पिया जा रहा है। पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए। बहाना राष्ट्रीय हो तो क्या कहने। पर यह जो सवाल उठा है, थोड़ा नैतिक किस्म का है यारो! आज शाम भुने काजू के साथ, नमकीन मूंगफली दोनों के साथ इस पर विचार करें। लड़खड़ाते हुए पहुंचें पर किसी निर्णय पर पहुंचें। मेरा निवेदन।

प्रश्नचिह्न यों खड़ा है कि ‘वन फॉर द रोड’ के अंतर्राष्ट्रीय सिद्धांत के अंतर्गत यदि कोई मेहमान किसी पार्टी से थोड़ी ज्यादा लेकर चले और भगवान न करे अगर कहीं रास्ते में एक्सीडेंट हो जाए। फिर चाहे गलती सामने से पीकर आने वाले की हो तो इसका दोषी कौन/ लेफ्ट-राइट के ट्रैफिक नियमों पर नहीं होगा। इस पर भी नहीं कि पीकर चला रहे थे। न्यूयॉर्क की अदालत अब उसे दोषी मानती है, जिसने ज्यादा पिलाकर सड़क पर छोड़ा। दोषी वो मेजबान होगा, जिसने ज्यादा पिला दी। वो दुकानदार या बार का मालिक होगा, जो भर-भर के देता है। गलती ठेकेदार की मानी जाएगी, जिसके अड्डे से लड़खड़ाकर चले। आधी रात को पुलिस दरवाजा खटखटाकर पूछेगी। वो चार्ली इधर से कितने पैग पीकर चला था/ तूने उसे इतना पीने क्यों दिया/ पी गया तो जाने क्यों दिया/ और आखिर में बतर्ज जयहिंद चल ‘चल थाने’। या थोड़ी बची हो तो हमें भी दे। आज ठंडी ज्यादा है। जो भी हो, कोर्ट में पेशी होगी। मीलाड हादसे का असल गुनहगार मिस्टर वर्मा है, जिसने महज तीन पीने वालों के लिए छह बोतलें खरीदीं, सिर्फ ढाई सौ ग्राम नमकीन इरादतन, ताकि ये रात को जब लड़खड़ाते उनके घर से निकलें, किसी एक्सीडेंट का शिकार हों।

सुहानी शामों में टेबल पर आग्रह की परंपरा पर यह सीधी चोट है मित्रो! बरसों पहले से उर्दू शायरी इस नतीजे पर पहुंच चुकी थी, जब शायर दर शायर ने यह बयान दिए कि असल कसूर साकी का है। कमबख्त ने ज्यादा पिला दी। यह साकी का न्याय है कि उसने किसी शायर को गालिब से कम न समझा। वह समीक्षक नहीं जो तुम्हें दर्जा दे। तुमने कहा कि गो हाथ में नहीं जुंबिश तो क्या, आंखों में दम तो है। रहने दो अभी सागर ओ मीना मेरे आगे। वह रखकर चला गया। गिराक की मर्जी है तो वो फिजूल में ना थोड़े बोलेगा। दूसरे, यह भी भारत की भूमि का ऐतिहासिक सत्य है मित्रो कि जो लड़खड़ाते हुए घर लौटता है, जनता उसके रास्ते से स्वयं हटकर उसे सम्मान देती है। पीने वाले गली दर गली, नाली दर नाली होते ‘घर’ नामक परम लक्ष्य तक पहुंच ही जाते हैं।

पीने वालों की एक प्रजाति ऐसी भी है जो पीती कम और बहकती ज्यादा है। कुछ ऐसे अहंवादी हैं जो शान से कहते हैं कि मैं कितनी भी ले लूं, मगर बहकता नहीं। और ऐसे तो बहुतेरे हैं जो बहकते हैं, मगर पूरे समय इस भ्रम में जीते हैं कि वे बहक नहीं रहे। ‘सहज समाधि भली’ के सिद्धांत पर दारू को सहज भाव से ले उसे स्वाभाविक परिणामों की ओर सहज रूप से अग्रसर और विस्तारित होने देने के कायल कम हैं। इन सब आधारों पर मैं कहना चाहूंगा मित्रो कि भारत की परिस्थितियां अमेरिका से भिन्न हैं, दारू की क्वालिटी की तरह। फिर भी क्या, लो। जब साहित्य, संस्कृति और स्टंट फिल्मों के मामले में अमेरिका भारत को प्रभावित कर जाता है तो इस नैतिक सवाल पर भी कर सकता है। इस पर चिंतन होना चाहिए।

शरद जोशी (मशहूर व्यंगकार )

loading...
Close
Close