दुबई का अनूठा जल प्रबंधन

दुबई जिसका भौगोलिक क्षेत्र 4114 वर्ग किलोमीटर है, इतना छोटा होते हुए भी यहाँ के विकास की स्थिति का उदाहरण यह है कि शहर का मुख्य मार्ग (शेख ज़ायद रोड) बारह लेन का है और यहाँ के विख्यात अंतराष्ट्रीय हवाई अड्डे का रन वे 4 किलोमीटर लंबा है। यहाँ “बुर्ज़ खलीफ़ा” नामक 160 मंज़िले टॉवर है जिसकी ऊँचाई 828 मीटर है। यह टॉवर वर्तमान में विश्व की सबसे ऊँची इमारत है।

इन सबसे भी विलक्षण बात यह है कि दुबई की औसत वार्षिक वर्षा मात्र 88 मिलीमीटर (3.5″) होने के बावजूद यहाँ पानी की भरपूर व्यवस्था है। जगह जगह श्रेणीबद्ध कृतिम झीलें और फव्वारे हैं, बड़े बड़े पार्क हैं और सड़कों के मध्य में तथा किनारों पर हरियाली व फुलवारियाँ है। यहाँ भयंकर गर्मी पड़ती है और अगस्त माह में अधिकतम तापमान 48 डिग्री सेंटीग्रेड तक हो जाता है फिर भी जगह जगह नीम और पीपल जैसे पेड़ लगाए जा रहे हैं और उनका समुचित रखरखाव भी किया जा रहा है।

इतनी कम वर्षा के कारण यहाँ न तो सतही जल है और न ही भू-जल है लेकिन समुद्र का लंबा किनारा है जिसके खारे पानी को विशाल अलवणीकरण केन्द्रों में उपचारित करके घरेलू और व्यावसायिक उपयोग के लिये जल की व्यवस्था की जाती है। वर्तमान में यहाँ सात अलवणीकरण केन्द्र संचालित हो रहे हैं जिनकी क्षमता 3.3 करोड़ गैलन (15 करोड़ लिटर) प्रतिदिन की है जबकि समग्र मांग 2.71 करोड़ गैलन (12.3 करोड़ लिटर) प्रतिदिन की ही है। यहाँ शुद्ध पानी को संग्रहित करने के लिये 4.3 करोड़ गैलन (19.5 करोड़ लिटर) क्षमता के संग्रहण जलाशय बने हुए हैं जो दैनिक माँग का 130% है या यों कहें कि आपतकाल में यदि जल शुद्धिकरण प्लांट काम करना बंद कर दें तो भी 30 घंटों से अधिक समय की आवश्यकता की पूर्ती संग्रहित जल से की जा सकती है। वहाँ अभी यह विचार चल रहा है कि अतिरिक्त जल शोधन क्षमता का उपयोग भू जल स्तर को बढ़ाने के लिये किया जावे ताकि किसी संकट के समय इस पानी को पंप करके काम में लिया जा सके।

दुबई में प्रतिदिन 1.93 करोड़ गैलन (8.77 करोड़ लिटर) गंदे पानी को साफ़ कर पुन:चक्रित किया जाता है जो सप्लाई का 71% है। गंदे पानी के पुन:उपयोग  की यह एक मिसाल है। इस पुन:चक्रित पानी से कृतिम झीलों को भरा रखा जाता है और पेड़ पौधों की सिंचाई की जाती है। सिंचाई के लिये स्वचालित ड्रिप इरिगेशन प्रणाली  काम में ली जाती है जिसकी दक्षता सामान्य सिंचाई प्रणाली से काफ़ी अधिक है और श्रमिकों पर आधारित भी नहीं रहना पड़ता है।

अत्यंत विषम परिस्थितियों में जल प्रबंधन कि यह उत्कृष्ठ व्यवस्था विकास आयोजन का अनूठा उदाहरण है। भारत में औसत वार्षिक वर्षा क्षेत्रानुसार 100 से 2400 मिलीमीटर है फिर यहाँ के शहरों में ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं है यह एक विचारणीय विषय है।

चीयर्स डेस्क 

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