टीडीएस को मापदंड मानकर आरओ खरीदना सही नहीं

पीने के पानी को शुद्ध करने के लिए के लिए और आरओ वाटर प्यूरीफायर की जरूरत के बारे में पड़ताल किए बिना ही लोग जल शोधन के लिए इसका उपयोग कर रहे हैं। पानी में टीडीएस की मात्रा का डर दिखाकर कंपनियां और डीलर्स धड़ल्ले से आरओ प्यारीफायर बेच रहे हैं। वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) द्वारा आयोजित एक कार्यशाला में जल शोधन की तकनीकों पर केंद्रित शोध एवं विकास से जुड़े विशेषज्ञों ने बताया कि आरओ का विकास ऐसे क्षेत्रों के लिए किया गया है, जहां पानी में घुलित खनिजों (टीडीएस) की अत्यधिक मात्रा पायी जाती है। इसलिए, सिर्फ टीडीएस को पानी की गुणवत्ता का मापदंड मानकर आरओ खरीदना सही नहीं है।

इंडिया वाटर क्वालिटी एसोसिएशन से जुड़े विशेषज्ञ वी.ए. राजू ने बताया कि “पानी की गुणवत्ता कई जैविक और अजैविक मापदंडों से मिलकर निर्धारित होती है। टीडीएस पानी की गुणवत्ता निर्धारित करने वाले 68 मापदंडों में से सिर्फ एक मापदंड है। पानी की गुणवत्ता को प्रभावित करने वाले जैविक तत्वों में कई प्रकार के बैक्टीरिया तथा वायरस हो सकते हैं।वहीं, अजैविक तत्वों में क्लोराइड, फ्लोराइड, आर्सेनिक, जिंक, शीशा, कैल्शियम, मैग्नीज, सल्फेट, नाइट्रेट जैसे खनिजों के साथ-साथ पानी का खारापन, पीएच मान, गंध, स्वादऔर रंग जैसे गुण शामिल हैं।”

नागपुर स्थित राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) के वैज्ञानिक डॉ पवन लभसेत्वार ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “जिन इलाकों में पानी ज्यादा खारा नहीं है, वहां रिवर्स ओस्मोसिस (आरओ) की जरूरत नहीं है। जिन जगहों पर पानी में टोटल डिजॉल्व्ड सॉलिड्स (टीडीएस) की मात्रा 500 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम है, वहां घरों में सप्लाई होने वाले नल का पानी सीधे पिया जा सकता है। आरओ का उपयोग अनावश्यक रूप से करने पर सेहत के लिए जरूरी कई महत्वपूर्ण खनिज तत्व भी पानी से अलग हो जाते हैं। इसीलिए, जल शुद्धीकरण की सही तकनीक का चयन करने से पहले यह निर्धारित करना जरूरी है कि आपके इलाके में पानी की गुणवत्ता कैसी है। उसके बाद ही जल शुद्धीकरण की तकनीकों का चयन किया जाना चाहिए।”

आरओ के उपयोग से करीब 70 प्रतिशत पानी बह जाता है और सिर्फ 30 प्रतिशत पीने के लिए मिलता है। एनजीटी ने यह भी कहा है कि 60 फीसदी से ज्यादा पानी देने वाले आरओ सिस्टम को ही मंजूरी दी जानी चाहिए। इसके अलावा, प्रस्तावित नीति में आरओ से 75 फीसदी पानी मिलने और रिजेक्ट पानी का उपयोग बर्तनों की धुलाई, फ्लशिंग, बागवानी, गाड़ियों और फर्श की धुलाई आदि में करने का प्रावधान होना चाहिए।

वी.ए. राजू ने बताया कि “आरओ के उपयोग से होने वाली पानी की बर्बादी एक प्रमुख समस्या है। पेयजल के बढ़ते संकट को देखते हुए आरओ वाटर प्यूरीफायर्स की रिकवरी क्षमता की ओर ध्यान देने की जरूरत है। ऐसे वाटर प्यूरीफायर्स के निर्माण को प्रोत्साहित करने की जरूरत है, जो पानी की अधिक रिकवरी कर सकें। इसीलिए, रिकवरी क्षमता के आधार पर आरओ संयंत्रों को बिजली के उपकरणों की तरह स्टार रेटिंग दी जाएगी। इसका प्रमाणीकरण इंटरनेशनल एसोशिएसन फॉर प्लंबिंग ऐंड मैकेनिकल ऑफिशियल्स द्वारा किया जाएगा। जबकि, इंडिया वाटर क्वालिटी एसोसिएशन समन्वयक की भूमिका में काम करेगा। ”सीएसआईआर के महानिदेशक डॉ शेखर मांडे ने कहा कि “देश भर के संस्थानों द्वारा पानी के शुद्धिकरण के लिए विभिन्न तकनीकों का विकास किया जा रहा है। स्टार्ट-अप कंपनियों के माध्यम से ऐसी तकनीकों को बढ़ावा दिया जा सकता है।”

चीयर्स डेस्क 

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