चुनाव में खपत बढ़ी, दूसरे राज्यों से हो रही भरपाई

ये बात ढकी छुपी नहीं है कि चुनाव में शराब की खपत अचानक बहुत बढ़ जाती है। यूपी में अन्य राज्यों की अपेक्षा शराब की कीमत ज्यादा है। यूपी में शराब की दुकानों को लाटरी के माध्यम से आवंटित किया जाता है, तब सभी दुकानों की लाइसेंस फीस व एक साल में शराब उठान (खरीदारी) का कोटा फिक्स कर दिया जाता है। ऐसे में प्रदेश की बहुत सी ऐसी दुकानें हैं जहां पर शराब की बिक्री अधिक है, लेकिन इनमें  शराब का कोटा कम है।

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यहीं से ब्लैक का जनम होता है। कम कोटे की दुकानों के मालिक अपने सेल्समैन के माध्यम से यूपी के बाहर की शराब को लाकर बेचने लगते हैं। सेल्समैन सभी को नहीं,नए ग्राहकों को बाहर वाली शराब बेचते हैं। मजे की बात यह है कि उन शराब की बोतलों में भी फर्जी होलोग्राम भी लगे होते हैं। कभी कभी ग्राहक शराब के स्वाद में अन्तर की शिकायत करता है तो दुकानदार यह कहकर झगड़ा करने पर आमादा हो जाता है कि बोतल खुल गई तो मेरा क्या दोष है।

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चुनाव के समय डुप्लीकेट शराब की धड़ल्ले से खपत होना बहुत आसान है, क्योंकि प्रचार में लगे सभी लोगों को निशुल्क मदिरा चाहिए। यूपी में शराब की दुकानों पर अंग्रेजी शराब की क्वार्टर, हाफ व बोतल की जो पैकिंग होती है वह वास्तविक कम्पनी की तरह नहीं होती है। इन बोतलों को उल्टा कर दिया जाए तो इसमें से शराब गिरने लगती है। डुप्लीकेट शराब होने की यह भी एक निशानी है।

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सूत्रों का कहना है कि इस तरह की शराब ड्रमों में भरकर प्रदेश के कुछ चुनिंदा स्थानों पर लाई जाती है, जहां बाद में पैकिंग मशीन से पैक कर फर्जी होलोग्राम लगा दिया जाता है। फिलहाल इस धंधे से प्रदेश सरकार को करोड़ों के आबकारी टैक्स की चपत लगाई जा रही है। अगर यह धंधा फलता-फूलता रहा तो कभी भी इस तरह की शराब पीने से बड़ा हादसा हो सकता है।

चीयर्स डेस्क

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