ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस ?

भारत सरकार इज ऑफ डूइंग बिजनेस का बड़े जोर शोर से प्रचार करती है, कि कैसे पिछली सरकारों की तुलना में भारत में बिज़नेस करना अब आसान हो गया है लेकिन हालात तो कुछ और ही हैं। यहाँ डिस्टलरीज खोलना आसान काम नहीं है। आपको के ये जान के हैरानी होगी कि डिस्टलरीज खोलने के लिए भारत में 11,000 लाइसेंस की जरूरत होती है। इन सभी लाइसेंस को हर साल रिन्यू भी कराना होता है। रिन्यू की फीस भी हर साल बढ़ती जाती है। पहल इंडिया फाउंडेशन की तरफ से इज ऑफ डूइंग बिजनेस इन इंडिया पर रिपोर्ट जारी करने के दौरान इस बात का खुलासा हुआ। रिपोर्ट को नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने जारी किया।

हर राज्य को 20-30 फीसदी का राजस्व मिलता है

इंटरनेशन स्पिरीट्स एंड वाइन एसोसिएशन ऑफ इंडिया के कार्यकारी चेयरमैन अमृति किरन सिंह ने बताया कि शराब उद्योग से हर राज्य को 20-30 फीसदी का राजस्व मिलता है। उन्होंने बताया कि शराब से सरकार को मिलने वाले राजस्व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अगर आप 100 रुपए की शराब खरीद रहे हैं तो उसमें से लगभग 66 रुपए सरकार के पास टैक्स के रूप में जाएंगे। इसके बावजूद शराब निर्माताओं को लगभग 11,000 लाइसेंस लेने पड़ते हैं। उन्होंने बताया कि एसोसिएशन ने सरकार से इज ऑफ डूइंग बिजनेस के तहत लाइसेंस की संख्या को कम करने की गुजारिश की है।

एक ब्रांड के लेबल रजिस्ट्रेशन पर सालाना 1 करोड़ रुपए खर्च

रिपोर्ट के मुताबिक एक शराब निर्माता भारत में हर साल शराब के एक ब्रांड के लेबल रजिस्ट्रेशन में सालाना 1 करोड़ रुपए खर्च करता है। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले छह सालों में शराब निर्माता उद्योग से मिलने वाले राजस्व में 6-14 फीसदी की बढ़ोतरी हो रही है। रिपोर्ट के मुताबिक देश के अल्कोहल पेय पदार्थों में सबसे अधिक 48 फीसदी की हिस्सेदारी देसी शराब की है। 36 फीसदी हिस्सेदारी इंडिया मेड फॉरेन लिकर (भारत में बनी विदेशी शराब) की है तो 13 फीसदी हिस्सेदारी बीयर की है। आयातित शराब की हिस्सेदारी सिर्फ 3 फीसदी है।

चीयर्स डेस्क 

loading...
Close
Close