प्लास्टिक की बोतल से कैंसर होने के नहीं मिले सबूत

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बताया कि प्लास्टिक बोतलों से पानी में जितना माइक्रोप्लास्टिक घुला होता हैए उसका मौजूदा स्तर काफी कम पाया गया है।  यही कारण है कि उससे सेहत पर पड़ने वाले असर को भी एक हल्का खतरा माना जा सकता है। पिछले एक साल में कई स्टडीज में नलके के पानी और बोतल के पानी में प्लास्टिक घुले होने की बात सामने आई है।  इसके कारण आम जनता में इसे लेकर काफी चिंताएं पैदा हो गई थीं।

संगठन की इस स्टडी से वे चिंताएं कुछ कम हो सकती हैं, संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी ने प्लास्टिक कणों के मुंह के रास्ते सेवन किए जाने से सेहत पर खतरे से जुड़ी पहली रिपोर्ट जारी की है।  रिपोर्ट में बताया गया है कि कचरे के पानी में मिलने के कारण पीने के पानी के स्रोतों में प्लास्टिक पहुंचता है, पानी की बोतलों में प्लास्टिक मिला होने के तार अकसर बोटलिंग प्रक्रिया से या फिर बोतल के प्लास्टिक वाले ढक्कनों से जु़ड़े मिले। विश्व स्वास्थ्य संगठन के सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण विभाग के ब्रूस गॉर्डन ने मीडिया को बतायाए ष्यहां मुख्य बात यही है कि पूरी दुनिया में पानी पीने वाली जनता को यह जान कर सुकून मिले कि इस परीक्षण के आधार पर खतरे का स्तर हल्का पाया गया।

लेखक और विश्व स्वास्थ्य संगठन की तकनीकी विशेषज्ञ जेनिफर दे फ्रांस ने बताया कि पानी में घुले ज्यादातर प्लास्टिक कणों का व्यास 150 माइक्रोमीटर से ज्यादा होता है और वे शरीर द्वारा उत्सर्जित कर दिए जाते हैंए जबकि छोटे कण पाचन तंत्र की दीवार को पार कर शरीर के दूसरे ऊत्तकों तक पहुंच जाते हैं। उन्होंने बताया है कि इसी कारण से ज्यादा चिंता पानी में घुले इन बेहद छोटे कणों को लेकर है।  हालांकि जेनिफर दे फ्रांस बताती हैं इन सबसे छोटे आकार वाले कणों के बारे में भी बहुत कम साक्ष्य हैं।  हमें अभी पता लगाना है कि वो शरीर में कैसे फैल रहा है और उसका असर कैसा हो रहा है। नेशनल ओशेनोग्राफी सेंटर ब्रिटेन में माइक्रोप्लास्टिक पर रिसर्च करने वाली एलिस हॉर्टन बताती हैं हम ये जानना है कि माइक्रोप्लास्टिक हमारे शरीर में केवल पानी के रास्ते ही नहीं पहुंचते, इसके और भी कई स्रोत हैं,जैसा कि पर्यावरण चैरिटी डब्ल्यूडब्ल्यूएएफ इंटरनेशनल की जून में आई एक स्टडी में बताया गया कि हमारे वातावरण में प्लास्टिक का इतना प्रदूषण है जिसके कारण इंसान हर हफ्ते में करीब पांच ग्राम प्लास्टिक को अपने अंदर ले रहा है जो हर हफ्ते एक क्रेडिट कार्ड खाने के बराबर है उस स्टडी में पाया गया कि पीने के पानी के अलावा प्लास्टिक का एक स्रोत शेलफिश का सेवन है।

माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी पीने के पानी में तेजी से बढ़ती जा रही है, लेकिन प्लास्टिक की बोतल में पानी पीने से कैंसर होता है, इसके अभी तक पुख्ता सबूत नहीं मिले हैं। हालांकि इसके साथ ही इस विषय पर WHO की ओर से जारी नई रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि प्लास्टिक का कम इस्तेमाल करना चाहिए, ताकि कम प्रदूषण हो। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्लास्टिक पर्यावरण में फैलकर किस तरह शरीर को प्रभावित करता है, इसे समझने के लिए और ज्यादा रिसर्च की जरूरत है।

5 मिमी से कम आकार वाले होते हैं माइक्रोप्लास्टिक

माइक्रोप्लास्टिक की कोई निश्चित परिभाषा नहीं है, लेकिन WHO के अनुसार माइक्रोप्लास्टिक प्लास्टिक के बहुत छोटे अंश या रेशे होते हैं, जिनका आकार सामान्यत: 5 मिमी से कम होता है। हालांकि पीने के पानी में यह कण 1 मिमी जितने छोटे भी हो सकते हैं। वास्तव में 1 मिमी से छोटे कणों को नैनोप्लास्टिक कहा जाता है।

इतने बड़े माइक्रोप्लास्टिक शरीर में नहीं जाते 
रिपोर्ट के अनुसार 150 माइक्रोमीटर (एक बाल की मोटाई) से बड़े माइक्रोप्लास्टिक्स के मानव शरीर में जाने की संभावना न के बराबर है, वहीं नैनो आकार के प्लास्टिक और बहुत छोटे माइक्रोप्लास्टिक कणों के शरीर में जाने की अधिक संभावना है, लेकिन उनके भी शरीर को नुकसान पहुंचाने वाली मात्रा में जमा होने की संभावना नहीं है।

200 करोड़ लोग दूषित पानी पीने को मजबूर
शोधकर्ताओं ने मानना है कि पीने के पानी में माइक्रोप्लास्टिक्स की नियमित निगरानी की आवश्यकता नहीं है। इसकी जगह हमें बैक्टीरिया और वायरस को दूर करने पर ज्यादा जोर देना चाहिए क्योंकि इनसे कहीं ज्यादा खतरा है। WHO की मानें तो दुनिया भर में लगभग 200 करोड़ लोग दूषित पानी पीने के लिए मजबूर हैं। लिहाजा पानी की सफाई पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है।

चीयर्स डेस्क 

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