शराब से सड़कों पर सबसे ज्यादा मरते हैं यूपी वाले

केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी द्वारा गुरुवार को लोकसभा में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में 2017 में शराब के नशे में ड्राइविंग के कारण सबसे अधिक सड़क दुर्घटनाएं दर्ज की गईं, जबकि 2016 से बिहार में ऐसे मामलों में भारी गिरावट देखी गई। 2017  में कुल 38,783 सड़क दुर्घटनाओं  में  से  उत्तर प्रदेश में शराब पीकर गाड़ी चलाने  के तहत लगभग 3,336 सड़क दुर्घटनाएँ दर्ज की गईं। आंकड़ों के अनुसार, बिहार में 2015 में 1,457 सड़क दुर्घटनाओं के बाद गिरावटआई और 2016 में  ये घटकर 593 हो गई,  2017 में बिहार में एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ ।

जुलाई 2017 में, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य और राष्ट्रीय राजमार्गों के 500 मीटर के दायरे में शराब की दुकानों पर प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया था। उससे दो साल पहले, 2015 में, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य में शराबबंदी लागू की थी।

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“रिपोर्ट और डेटा बिहार सरकार द्वारा शराबबंदी लागू करने के फ़ैसले को सही साबित करता  है । बिहार सरकार के सूचना और जनसंपर्क विभाग (IPRD) के मंत्री नीरज कुमार ने कहा कि नीतीश कुमार सरकार के इस फैसले से न केवल समाज की मदद की है, बल्कि कई लोगों के जीवन की रक्षा भी की है।बिहार के परिवहन सचिव संजय अग्रवाल ने कहा कि शराबबंदी के बाद से बिहार में सड़क दुर्घटनाओं की संख्या नगण्य हो गई है।

बिहार के अलावा, गुजरात, केरल, नागालैंड, मणिपुर और लक्षद्वीप के केंद्र शासित प्रदेशों में शराब बंदी  लागू है। इन राज्यों ने 2017 में शराब पीकर गाड़ी चलाने की  कुछ ही दुर्घटनाओं को दर्ज किया – गुजरात (65), केरल (113), नागालैंड (157), मणिपुर (44) और लक्षद्वीप (0)। नागालैंड में 2015 में दो और 2016 में 13 मामले दर्ज किए गए।

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शराब पीकर गाड़ी चलाने  पर  “मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 185 में कारावास की सजा या जुर्माना दोनों का प्रावधान है। सभी राज्य सरकारों / केंद्रशासित प्रदेशों से अनुरोध किया गया है कि वे यह सुनिश्चित करें कि राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे शराब विक्रेताओं को कोई लाइसेंस जारी न किया जाए। इसके अलावा, उनसे उन मामलों की समीक्षा करने का भी अनुरोध किया गया है जहां राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे शराब विक्रेताओं को लाइसेंस पहले ही दिए जा चुके हैं तो उन मामलों में सुधारात्मक कार्रवाई करने के लिए कहा गया है।

यह भी पता चला है कि  “आंकड़ों को बड़े पैमाने पर कम करके बताया जाता है क्योंकि ज्यादातर सड़क दुर्घटनाएं जो घातक नहीं होती हैं, उनकी जांच ठीक से नहीं की जाती है। यहां तक कि जो घातक हैं, उनमें भी केवल डी एंड डी (पीने और ड्राइविंग) के लिए जांच की जा सकती है, अगर दुर्घटना के छह घंटे के भीतर आरोपी को परीक्षण करवाया गया है । ”

चीयर्स डेस्क 

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