रूस में वोदका ही बन रही मौत की वजह

रूस में बिना वोदका के जिंदगी की कल्पना करना मुश्किल है। वहां पानी को भी वोदका ही कहा जाता है। हड्डियों  को गला देने वाली सर्दी से निजात पाने के लिए रूसियों को वोदका का सहारा लेना ही पड़ता है। लेकिन यही वोदका अब उनके लिए ज़हर बनती जा रही है क्योंकि ज्यादा वोदका पीने से रूसी अब मरने लगे हैं।

डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों पर टेस्ट करने के बाद रिसर्चर इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि वोदका रूस में लोगों की मौत का बड़ा कारण बन चुकी है। सन 1999 से 2010 के बीच बारनॉल, बीस्क और टॉम्स्क शहरों में वोदका पीने वाले लोगों के आंकड़े जमा किए गए और उनसे पूछा गया कि वे कितनी शराब पीते हैं। रिसर्च के दौरान ही 8,000 लोगों की जान चली गई। तब उनके मौत के कारण पर भी ध्यान दिया गया। नतीजों में पाया गया कि जो लोग हफ्ते में एक से डेढ़ लीटर वोदका पीते हैं उनका 55 की उम्र तक मरने का खतरा 35 फीसदी तक बढ़ जाता है।

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शोध से पता चला है कि एक चैथाई से ज्यादा रूसी पुरुषों की मौत 55 साल से पहले ही हो जाती है। जब अन्य देशों से इसकी तुलना की गई तो देखा गया कि ब्रिटेन में 55 की उम्र से कम केवल सात फीसदी लोगों का निधन होता है, जबकि अमेरिका में यह संख्या महज एक फीसदी है। रूस में लोगों की औसत आयु 64 साल है और वह दुनिया के उन 50 देशों में शामिल है जहां जीवन दर सबसे कम है।

इस रिसर्च का नेतृत्व करने वाले ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी के सर रिचर्ड पेटो का कहना है कि औसतन रूस का हर व्यक्ति सालाना 20 लीटर वोदका पीता है। रूस के लोग वाकई बहुत शराब पीते हैं और उनमें एक आदत होती है कि वोदका पी कर जब वे नशे में धुत्त भी हो जाते हैं तब भी वे पीना जारी रखते हैं, यही खतरनाक है। रूस में देसी वोदका सस्ते में मिल जाती है। यूरोप से तुलना करते हुए उन्होंने कहा, फिनलैंड और पोलैंड में भी बहुत पीने की संस्कृति है, लेकिन वहां रूस की तरह मौत का ज़रा भी खतरा नहीं है।

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पेटो ने कहा कि रूस में महिलाएं भी काफी वोदका पीती हैं, लेकिन उनकी सेहत पर होने वाले असर पर अभी तक कोई रिसर्च नहीं की गई है। लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन के डेविड लिओन ने इस बारे में बताया, अगर आप वोदका पी रहे हैं, तो आपके शरीर में भारी मात्रा में इथेनॉल जमा होने लगेगा। जबकि बीयर पीने पर ऐसा नहीं होता। उन्होंने कहा कि रूस में पीना संस्कृति का हिस्सा है और लोगों की आदतों को बदलना जरूरी है। रूस में इसे गलत नहीं माना जाता कि आप तब तक पीते रहें जब तक आप कुछ करने लायक ही ना बचें। वहां यह आपकी मर्दानगी को दिखाता है और आपसे उम्मीद की जाती है कि आप खूब पिएं।

रिपोर्ट में बताया गया है कि मिखाइल गोर्बाचोव ने 1985 में शराब पर कई तरह की रोक लगाई थी। उस समय देश में शराब की खपत में 25 फीसदी कमी देखी गई थी और मृत्यु दर में भी गिरावट आई थी। लेकिन साम्यवाद के खत्म होने के साथ एक बार फिर शराब की खपत तेजी से बढ़ गई और साथ में मृत्यु दर भी।

चीयर्स डेस्क

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