लखनऊ में ही नहीं रोका जा पा रहा अवैध शराब का कारोबार

क्या कभी राजधानी लखनऊ में अवैध जहरीली शराब बनाने को पुलिस या आबकारी विभाग रोक पाएगा। जब जब मौतें होती हैं तब तब लखनऊ के आस पास के इलाकों में शराब की अवैध भट्ठियों  की खबरें और फोटो छपते हैं। फिर सब कुछ समान्य हो जाता है। जब लखनऊ में ही शराब का उत्पादन नहीं रोका जा पा रहा है तो पूरे प्रदेश में कच्ची अवैध शराब बनाने पर अंकुश लग पाएगा, इसमें संदेह है।

जब जब अवैध शराब पीने से मरने वालों की अर्थियां उठती हैं, उनके रोते बिलखते परिजनों की फोटो अखबारों में छपती है तब तब पुलिस प्रशासन कच्ची और अवैध शराब के उत्पादन और तस्करी पर रोक लगाने की बात कहती है। लेकिन ग्रामीण इलाकों में अभी भी चोरी छिपे अवैध शराब का कारोबार वैध रूप में संचालित हो रहा है।

राजधानी लखनऊ के मोहनलालगंज, गोसाईगंज, नगराम, निगोहां, मलिहाबाद, माल, आशियाना और बंथरा क्षेत्र में कच्ची शराब के कारोबारी धड़ल्ले से अवैध कारोबार कर रहे हैं। वहीं उन्नाव जिले के असरेंदा गांव में भी कच्ची जहरीली शराब बनाने का काम होता है। कभी कभी पुलिस और आबकारी विभाग के लोग अभियान के नाम पर कुछ लोगों को पकड़ते हैं, लेकिन इसका कोई असर नजर नहीं पड़ता है।

इस बारे में चीयर्स डाॅट काॅम ने इस सम्बंध में कई जानकारों से बात की तो पता चला कि बड़े कारोबारी एक दिन में दो से तीन हजार लीटर शराब बनवाकर बेच देते हैं। कच्ची पीने वाले कई कामगारों ने बताया कि माल के रामनगर गांव और मोहनलालगंज के इंद्रजीत खेड़ा में शाम ढलते ही नहर के किनारे इसकी बिक्री होने लगती है। कारोबारी कच्ची शराब बनाने के लिए गुड़, यूरिया, खाद्य, महुआ और खमीर का इस्तेमाल करते हैं।

कम दाम में तेज तीव्रता
अंग्रेजी शराब तो मंहगी होती ही है, सरकारी दुकानों से मिलने वाली देशी शराब भी काफी मंहगी होती है। सरकारी देशी शराब का पव्वा औसतन 25-30 रुपए को होता है जबकि देशी कच्ची इसके आधे से भी कम दामों में मिल जाती है। अवैध देशी शराब बहुत ही सस्ती होती है और इसकी तीव्रता भी सरकारी देशी के मुकाबले अधिक होती है। शराब में सारा खेल तीव्रता का ही होता है। तीव्रता से ही नशा चढ़ता है। जितनी अधिक तीव्रता उतना अधिक नशा।

इसके कारोबारी बताते हैं कि सरकारी देशी शराब की निर्माता कंपनियां जानबूझकर इसकी तीव्रता कम रखती हैं। इसके पीछे दो कारण हैं, एक तो ये कि नशा कम हो ताकि गरीब आदमी काम धाम करता रहे। दूसरे अवैध शराब माफिया की चाल भी है इसके पीछे कि नशा नहीं होगा तो मजदूर अपनी थकान उतारने के लिए कच्चंी का रुख करेगा जो कि सस्ती भी होती है और अधिक नशा भी करती हैै। कच्ची शराब की बिक्री 90 से 100 रुपये प्रति लीटर के हिसाब से करते हैं। इस कारोबार को गिरोह के रूप में संचालित किया जाता है, जिसमें ग्रामीणों की भूमिका भी शामिल होती है। पुलिस की मिलीभगत के बिना भी ये संभव नहीं है।

चीयर्स डेस्क

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