महुआ वाली शराब भी जल्द छा सकती है बाजार में

मेक्सिको में टकीला है। जापान की साके है। कोरिया में सोजू है। भारत अब महुआ की बात कर रहा है। गोवा के डिस्टिलर डेसमंड नाजरेथ ने जिस प्रकार से भारतीय आदिवासी पेय से प्रेरित महुआ का हाल ही में लॉन्च किया है, उसने ताड़ी, फेनी और हंडिया सहित हेरिटेज शराब की अवधारणा को सुर्खियों में ला दिया है। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि गोवा के बाद, बेंगलुरू इन देशी शराब की प्रोफाइल को वाणिज्यिक क्षेत्र में बढ़ाने के लिए प्रमुख बाजार हो सकता है।

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नाजरेथ , जिन्होंने बेंगलुरु के एक बार में महुआ के नमूने के बैच के सफल परीक्षणों के बारे में सुना, उनका मानना है कि फूल से बनी शराब कॉकटेल के लिए एक उत्कृष्ट आधार बनाएगी। नाजरेथ ने पिछले पांच वर्षों में अपनी हेरिटेज शराब एगेव (टकीला) और नागपुर ऑरेंज लिकर के साथ बेंगलुरु में सफलता का स्वाद चखा है। उन्होंने कहा, कर्नाटक में ’हमारे पास आगेव श्रेणी में 30-40 प्रतिशत बाजार की हिस्सेदारी है और ऑरेंज लिकर सेगमेंट में 50-60 फीसद की हिस्सेदारी है, बेंगलुरु हमारा मुख्य बाजार है।’

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नाजेरथ की डिस्टिलरी की महुआ ने पहले ही गोवा के बाजार को प्रभावित किया हुआ है, उन्होंने दावा किया है कि दो महीने में 200 पेटी बेच चुके हैं। शैम्पेन और प्रोसेको के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए महुआ, जबर्दस्त तरीके से तैयार है। महुआ मीठे फूल से बनी दुनिया की एकमात्र डिस्टिल्ड स्पिरिट है। अध्ययन से पता चलता है कि भारत में प्रतिवर्ष 10 लाख टन से अधिक महुआ के फूलों का उत्पादन होता है, जिसमें अधिकतम योगदान छत्तीसगढ़ का है।

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इस बारे में बात होने लगी है कि कैसे गोवा ने मुख्यधारा के बाजार में फेनी लाकर एक उदाहरण पेश किया है। माना जाता है कि “स्थानीय नेता, नैतिकता और देशी शराब से जुड़े शर्म के भाव के चलते इसे अभी तक इसका वास्तविक मुकाम हासिल नहीं हो पाया है। नाजरेथ ने कहा, ’जिस क्षण हम देशी शराब की डिस्टिलिंग गुणवत्ता में निखार लाकर उसकी प्रोफाइल में इजाफा करेंगे, तो इसे भी यूरोप की वाइन की तरह लोग पसंद करेंगे।’

चीयर्स डेस्क

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