बेगम अख्तर ने शराब के साथ कमरे में बंद कर दिया था कैफी आज़मी को

कैफी आज़मी, जबर्दस्त किस्म के कामरेड और बेहद कामयाब गीतकार। ’…अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों…’ जैसे शानदार गीत लिखने वाले कैफी को कम उम्र में ही लकवा मार गया था और उनका आधा शरीर ठीक से काम नहीं करता था। इसके बावजूद उनके हौसले और हिम्मत में कोई कमी नहीं आई और उन्होंने मरते दम तक शायरी की। ’झुकी झुकी सी नज़र….’ जब जगजीत सिंह ने गाई तो लोग झूम झूम गए थे।

झूम उठता है मयख़ाना, जब हाथों में जाम लेता हूं

कैफी आज़मी गज़लकार थे और गज़ल में जान फूंक देने का माददा रखने वाली बेगम अख्तर….जब ये दोनों मिले तो कुछ कमाल तो होना ही था। एक शब्दों का बादशाह तो दूसरी सुरों की मलिका। बेगम अख्तर, ने कई बड़े उस्तादों से मोसिकी की तालीम भी ली। इसलिए उनकी गायकी में ग्वालियर घराने की जादुई तानें, किराना घराने की बढ़त, पटियाला घराने की रूमानियत और पूरब अंग की खुश्बू थी। शायरों में उनसे सबसे करीब अगर उनसे कोई था, तो वो थे कैफी आजमी। कैफी बेगम के बारे में कहा करते थे कि गजल सिर्फ सुनने को नहीं, बल्कि देखने को भी मिलती है।

एक बार की बात है कि बेगम अख्तर कैफी से मिलना चाहती थीं, तो कैफी को झूठी खबर भेजी गई कि उनकी तबीयत बहुत खराब है, पता नहीं फिर मिल पाएं या नहीं। कैफी ने यह सुना तो भागते भागते आए और देखा तो बेगम मज़े से सिगरेट का धुंआ उड़ा रही हैं। इस पर कैफी नाराज़ होने के बजाए मुस्कुरा दिए, समझ गए कि माजरा क्या है। तब बेगम ने उनसे कहा, ’एक गजल पूरी करनी है, उसका मक्ता नहीं है, इसलिए बुलाया है तुम्हें’। बेगम ने कैफी साहब को एक बोतल शराब के साथ कमरे में बंद कर दिया और कहा लिखो, तभी दरवाजा खोलूगीं जब गज़ल पूरी हो जाएगी। तब उस बंद कमरे में एक बोतल शराब के साथ कैफी ने वो मक्ता लिखा:

’हुआ है हुक्म कि कैफी को संगसार करो,
मसीह बैठे है छुप के कहां खुदा जाने’

इसी तरह मतला (गजल का पहला शेर) भी लिखा और पूरी गज़ल भी। दरवाजा खुला और कैफी आजमी जाने लगे, तो बेगम ने एक नज्म सुनाई,

’पाया भी उनको, खो भी दिया,
चुप भी हो रहे…
इक मुख्तसर सी रात में सदियां गुजर गईं.’

ये नज़्म सुनकर कैफी आज़मी तकरीबन रो ही बैठे, उनका गला भर आया। बेगम ने उनसे रोने की वजह पूछी, तो कैफी ने अपनी वह पहली गजल, जो सिर्फ 11 साल की उम्र में लिखी थी, उसका एक शेर पेश कर दिया।

’मुद्दत के बाद उसने जो की लुत्फ की निगाह,
जी खुश तो हो गया मगर आंसू निकल पड़े.’

बाद में बेगम ने कैफी की इस ग़ज़ल को राग ’मिश्र काफी’ में गाया भी। काफी अर्सा यूं ही गुजर गया। वक्त आगे बढ़ा और बेगम की तबीयत दिन पर दिन बिगड़ने लगी थी। बेगम अख्तर की जिंदगी कि आखिरी रिकॉर्डिंग में उनके साथ कैफी आजमी थे।

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रिकॉर्डिंग के दौरान जब कैफी से पूछा गया कि उन्होंने गजलें किस लिए लिखना शुरू किया, तो उनका जवाब आया, ’मैंने गजलें इसलिए लिखना शुरू कीं, जिसलिए ग़ालिब मुस्सवरी सीखना चाहते थे… सोचा अगर मैं गजल कहूंगा, तो मैं गजल के करीब हो जाऊंगा और सिर्फ इसलिए ही लिखना शुरू किया और बेगम अख्तर की तरफ इशारा करते हुए कहा, बेगम साहिबा के सामने आकर सिर्फ गजल सुनने को नहीं, गजल देखने को मिलती है’।

चीयर्स डाॅट काॅम की टीम की ओर से इस दौर के बेहद अहम और जीवन भर साम्प्रदायिकता से लड़ने वाले प्रगतिशील शायर कैफी आज़मी को उकनी 17वीं पुण्य तिथि पर भावभीनी श्रद्धांजलि।

चीयर्स डेस्क 

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