आखिर यूपी में नशा उन्मूलन हो भी कैसे !

एक  तरफ यूपी सरकार जहाँ शराब से राजस्व  प्राप्ति के नए -नए कीर्तिमान स्थापित कर रही है तो वहीं दूसरी तरफ मद्य निषेद्य विभाग को  महज दिखावे  के लिए पोषित कर रही है । इस विभाग के पास बजट के नाम पर कुछ भी नहीं  है और जो कुछ है भी वो भी आबकारी विभाग के भरोसे । यूपी के सभी विभाग जहां लगातार तरक्की कर रहे हैं, वहीं प्रदेश का महत्वपूर्ण मद्य निषेद्य विभाग परजीवी हो गया है।  आबकारी विभाग शराब की बिक्री कर प्रत्येक वर्ष 25 हजार करोड़ से अधिक की राजस्व प्राप्ति कर रहा है। ऐेसी स्थिति में आबकारी विभाग आखिर क्यों चाहेगा कि उसे राजस्व की हानि हो। अब यहां शराब बेचने वाले के भरोसे ही नशा उन्मूलन है।

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मद्य निषेद्य विभाग के जरिये नशा एवं नशीले पदार्थों के दुष्परिणाम के बारे में जागरूकता  लाने के लिए विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से शिक्षण संस्थाओं व ग्रामीण अंचलों में खेलकूद प्रतियोगिता व गोष्ठियों का आयोजन किया जा रहा है। विभाग का मानना है कि प्रभातफेरी, वाल पेन्टिग व होर्डिग्स पर जानकारियों  के माध्यम जनमानस  में नशा से छुटकारे के लिए जागरूकता लाने का प्रयास किया जा रहा है।

 सामाजिक संस्थाओं द्वारा संचालित नशा निव्र्यसन केंद्र जो सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय भारत सरकार से अनुदानित है, जो नशा से ग्रसित लोगों को उपचार करने के लिए प्रेरित करते हैं वहीं  मद्य निषेध विभाग सिर्फ सरकारी आंकड़ों में चलता है। इनके द्वारा कभी किसी स्कूल,कालेज या ग्रामीण क्षेत्रों किसी भी प्रकार का जागरूकता कार्यक्रम नहीं आयोजित किया गया जाता है।

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लोगों का कहना है कि जब शराब बेचने वालों के ही जिम्मे नशा उन्मूलन की जिम्मेदारी दी जायेगी तो संभव नहीं है कि वह शराब की बिक्री पर अंकुश लगाने की बात कर समाज को जागरूक करें। मद्य निषेध विभाग ने प्रचार-प्रसार के मद में 2016-17 में 28 लाख, 83 हजार व 2017-18 में इसी के आसपास बजट उपलब्ध कराया था। यह बजट ऊंट के मुंह में जीरा है।  प्रदेश के युवाओं में नशे के प्रति बढ़ती लत यहां के युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। सरकार को नशा उन्मूलन के दिशा में मजबूत कदम उठाने की जरूरत है।

चीयर्स डेस्क

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