ज़हरीली शराब से मरे, न मुआवज़ा, न पकड़ा गया माफिया

जहरीली शराब पीकर मरने वालों का वास्तव में कोई कसूर नहीं होता। वह भी उसी तरह के शराब उपभोक्ता हैं, जैसे अंग्रेजी पीने वाले। अगर शराब जहरीली निकले तो सज़ा जहरीली शराब बनाने वाले को मिलनी चाहिए। लेकिन अक्सर होता ये है कि जो मरा उसके साथ सहानुभूति के बजाए उसे ही दोषी मानकर मामला ठंडा पड़ जाता है।

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पिछले दिनों रौनापार व जीयनपुर में जहरीली शराब पीकर मरने वाले करीब तीन दर्जन लोगों में से 21 को शराब से मौत होना मानकर प्रदेश की सरकार ने उनके आश्रितों को सवा दो सवा दो लाख रूपए की आर्थिक सहायता दी है मगर वर्ष 2013 में मुबारकपुर इलाके में जो 46 लोग जहरीली शराब पीकर मर गए उनके आश्रितों को फूटी कौड़ी भी नसीब नहीं हुई। मुबारकपुर में जो लोग मरे थे वह किस हाल में थे और आज उनके परिजन किस हाल में हैं इसको पेश करती विशेष रिपोर्ट की पहली किस्त।

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मुबारकपुर का आदमपुर गांव
आदमपुर प्राइमरी पाठशाला से आगे गांव में घुसते ही रोड से दाहिने ओर मोती चैहान पुत्र लक्खन चैहान का घर है। मोती चैहान की बेवा सुराती देवी घर के बाहर बैठी पथराई आखों से आने जाने वालों को निहार रही थी। जहरीली शराब ने सुराती से उसकी जिन्दगी, उसका पति ही छीन लिया था। साठ साल को होने को आए मोती चैहान के तीन लड़के हैं। तीनों गारामाटी का काम करते हैं, जमीन के नाम पर कुल पांच बिस्वा की काश्तकारी है। आर्थिक सहयोग के बाबत पूछने पर उसकी आंखों में आंसू थरथराने लगे। बोली कुछ भी नहीं बस ना में सिर हिला दिया। इसी गांव के दक्षिणी हिस्से में घुरभारी उर्फ घूरे चैहान का घर है। वही घूरे चैहान जिसे पुलिस ने अवैध शराब का कारोबारी बताया था। इस घर से कुल तीन लाशें उठी थी। तीन ही थे तीनों मर गए। घूरे पाउच बेचता था, यह बात सही है लेकिन वह शराब का कारोबारी नहीं था। ईट पर ईंट रखकर खड़ी की गई आड़ और उस पर टीन की छत जिसमें मौके पर भैंस बंधी थी आसपास के लोगों ने बताया कि यहीं घूरे की शराब की दुकान थी। असल बात यह कि घूरे को खुद पीने की लत थी, यही खर्च निकालने के लिए वह आस पास के लोगों को दस बीस पाउच बेचकर स्वयं के लिए एक दो पाउच का जुगाड़ कर लेता था।

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घूरे की पत्नी रोते हुए बताती है कि इस गांव में जहरीली शराब से पहली मौत गोपाल की हुई। गोपाल पुत्र लोचन चैहान उम्र 34 वर्ष की मौत की खबर सुनते ही ये घबराने लगे थे कहने लगे कि मेरी आंख से कम दिखाई दे रहा है। मैंने कहा जा अऊर पी आवा। लड़का मुबारकपुर सरकारी अस्पताल में ले गया । डाक्टर ने कहा ठीक है ले जाओ। रात में अधिकारी आए वह जिला अस्पताल ले गए वहां से बनारस भेज दिए। रास्ते में ही मौत हो गई। कहने लगी पीयत त रोज रहलैं बहुत मने करत रहली कबो कबो झगड़ा कर लेत रहनी छोट छोट पाउच ले आवत रहन दस रूपया का। वही बताई पड़ोस के गांव नरावं से बिकने के लिए आती थी यह शराब। गोपाल की पत्नी उमरायी की उम्र 36 37 वर्ष के आस पास है। पांच बच्चियां सुषमा, प्रतिमा, रेशमा, सीमा, करिश्मा और तीन बेटे, हिमांशु, अमन व छोटू ।

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छोटू पेट में था जब गोपाल को शराब निगल गई। उमरायी की आंखों में अभी भी सारे दृश्य तरोताजा हैं। जरा सा कुरेदने पर फूट पड़ती है। रोते रोते बताती है पीकर आए तो हमने सोचा रोज की तरह ही पीकर आए होंगे। कुछ घंटों बाद अचानक कहने लगे अंखिया से न लउकत हव। दौड़ना धूपना शुरू किया। अस्पताल लेकर गए लेकिन कुछ भी हाथ न लगा। पुतली अंदर घुस गई थी। रोशनी गायब हो गई थी। सिर पीट रहे थे। सिर पकड़ कर घूम रहे थे। कह रहे थे बहुत शराब पी लेकिन ऐसी नहीं। आज क्या हो गया दीवार पकड़ कर रोते थे। होठ आंख सब करिया हो गया था। पूरा शरीर काला पड़ता जा रहा था। कुछ ही देर बाद छटपटाते छटपटाते सो गए फिर कभी नहीं उठे। वह बढ़ईगिरी करते थे सब पी जाते थे। कुछ नहीं छोड़ा।

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रामप्यारे पुत्र विश्वनाथ उम्र 35 वर्ष सहित आदमपुर में कुल आठ लोग शराब के शिकार हुए थे। इनमें से केवल तीन का ही पोस्टमार्टम हुआ था। गांव के लोग बताते हैं कि प्रशासन ने घटना को दबाने की पूरी कोशिश की। लाशों को जल्दी दफनाने फूंकने के लिए दबाव बनाया। यह शराब आती कहां से थी के जबाव में अधिकांश ने नरांव का नाम लिया। कुछ एक जानकार लोग मुलायम का नाम लिए। घूरे की विधवा भी कह रही थी केरमा क मुलायमा के इहां से नरांव, नरांव से जगह जगह भेजि जात रहल इ जहर। घूरे के बड़े लड़के का नाम शास्त्री उम्र 42 वर्ष था। घूरे के सात बच्चे थे। पांच लड़कियां दो लड़के। छोटा बेटा संजय 35 वर्ष का था। संजय की तीन लड़की और एक लड़का है। घूरे शास्त्री और संजय तीनों मर गए थे। कोई दाग देने वाला नहीं बचा था। पहले बूढ़े पिता के प्राण निकले फिर नौजवान पुत्रों के। गांव वाले मानते हैं दोनों की गलती थी। पीने वालों की भी और पिलाने वाले की भी। गांव में ही बिकने के कारण उधारबारी लेकर भी पी लेते थे लोग। बाजार या ठेके से पीने के लिए नकद चाहिए होता है।

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आदमपुर के पूर्व ग्राम प्रधान जंगबहादुर चैहान बताते हैं कि मेहनत मजदूरी और खेती बारी ही गांव के लोगों की आजीविका का जरिया है। तीन हजार के आसपास के आबादी वाले इस गांव में आधा दर्जन लोग सरकारी नौकरी में हैं। गांव में चैहान और मुसलमान आबादी है। एक घर जायसवाल परिवार भी है। 2006-7 में आदमपुर को निर्मल ग्राम पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। घर .घर बनवाए गए शौचालय दिखते भी हैं। स्वच्छता का राष्ट्रीय पुरस्कार और शिक्षा में इतना पीछे पूछने पर वह बताते हैं कि कभी २०० लूम चलते थे इस गांव में। काम धंधे की कोई कमी नहीं थी। हमेशा बुनाई चलती रहती थी। ऐसे में सब लोग कमाने में लग गए। पढ़ाई लिखाई नहीं किए। लेकिन एक तूफान आया और सब खत्म हो गया। कैसा तूफान के सवाल पर कहने लगे फैशन का तूफान, हम जो बनाते थे उसे बाजार ने नकार दिया। अब गांव में एक भी लूम नहीं है। तब बहुत खुशहाली थी अब कुछ लोगों ने पढना लिखना शुरू किया है। आगे पढ़ें ……..

आजमगढ से संदीप अस्थाना

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