ज़हरीली शराब पीकर मरने वालों के प्रति संवेदनहीन मीडिया!

ज़हरीली शराब पीकर मर जाने वाला व्यक्ति क्या अपराधी होता है, क्या वह जान बूझकर ज़हरीली शराब पीता है और क्या वह इस तरह की मौत के लिए अभिशप्त है….इस तरह के कई सवाल ज़ह्न में आते हैं, जब ज़हरीली शराब से मर गए लोगों और उनके परिजनों के साथ सिविल सोसाइटी का सलूक दिखता है। बेहद उपेक्षित, गिरी निगाह से देखे जाने जैसा और अक्सर बेहद क्रूर और असभ्य…।

हाल ही में यूपी के सहारनपुर और कुशीनगर में करीब सवा सौ लोगों की ज़हरीली शराब से हुई मौतों के मामले में भी ऐसा ही नज़र आया था जैसा अब असम में उन लोगों के साथ दिख रहा है जिनके घरवाले ज़हरीली शराब पीकर मर गए हैं। सिविल सोसाइटी चुकि इन लोगों के साथ अच्छा सुलूक नहीं करती, तो जाहिर है कि सरकार क्यों करे। लेकिन सबसे ज्यादा चिंता और गहरे अवसाद का विषय है, मीडिया की इन लोगों के प्रति संवेदनहीनता।

अखबारों और न्यूज चैनल्स की बात जब तब होती रहती है, ऑनलाइन मीडिया का मिज़ाज क्या है, इस मामले में, तो पता चला कि ऑनलाइन मीडिया भी ज़हरीली शराब पीकर मर जाने वालों के लिए उतना ही संवेदनहीन है जितना कि न्यूज़ चैनल्स या समाचार पत्र। असम के गोलाघाट और जोरहाट में ज़हरीली शराब पीकर करीब डेढ़ सौ लोग मर गए। शनिवार 24 फरवरी को ही सौ से ज्यादा लोग मर गए थे, ये सिलसिला 25 फरवरी यानी सोमवार तक जारी रहा। सोमवार, 25 फरवरी को शाम चार बजकर 19 मिनटर पर एनडीटीवी खबर डाॅट काॅम के होम पर पेज पर करीब 141 टेक्स्ट समाचार और वीडियोज़ में से असम में मर रहे लोगों की खबर नदारद थी। ट्रेंडिंग कर रही छह खबरों में भी ये खबर नहीं थी, लेटेस्ट खबरों में भी नहीं थी। यही हाल इसके सहयोगी अंग्रेजी एनडीटीवी डाॅट काॅम पर चार बजकर 22 मिनट पर था। इसके होम पेज पर कुल करीब 112 समाचारों (टेक्स्ट, वीडियो आदि) में असम की ये खबर नहीं थी।

टाइम्स ऑफ इंडिया डाॅट काॅम के होम पेज पर करीब 150 से अधिक खबरों में चार बजकर 25 मिनट पर असम में ज़हरीली शराब पीकर मरने वालों की खबर नहीं थी। इस वेबसाइट की लेटेस्ट 19 खबरों और टाॅप न्यूज स्टोरीज़ की आठ खबरों में भी असम की मौतें  शामिल नहीं थीं। जागरण डाॅट काॅम का हाल भी इनमें से किसी से जुदा नहीं निकला। चार बजकर 38 मिनट पर इसके होम पेज पर करीब 93 समाचार चल रहे थे लेकिन इनमें असम की मौतें नहीं थीं। इस साइट पर मोबाइल फोन के प्रमोशन, टेक ज्ञान के साथ जन्म कुंडली और वेब संसार के समाचारों का बोल बाला दिख रहा था। लाइव हिंदुस्तान  डाॅट काॅम के होम पेज पर चार बजकर 40 मिनट पर करीब 130 समाचार चल रहे थे, इनमें गैजेट्स, जीवन शैली, हेल्थ और क्राइम समेत सभी कुछ था, नहीं थी तो असम की खबर,  जहां के अस्पतालों में लगातार मौत का साया ज़हरीली शराब पीने वालों पर मंडरा रहा था। इस साइट पर प्रमुखता से एक खबर वीडियो में थी कि पुणे में बोरवेल में छह साल के बच्चे को 16 घंटो की मशक्कत के बाद निकाल लिया गया।

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अमर उजाला डाॅट काॅम के होम पेज पर चार बजकर 44 मिनट पर वीडियो, टेक्स्ट फोटो आदि मिलाकर लगभग 189 समाचार चल रहे थे लेकिन इनमें से एक में भी असम की खबर नहीं थी। नवभारत टाइम्स डाॅट काॅम के होम पेज पर चार बजकर 52 मिनट पर जोश-ए-जवानी (व्याकरण के अनुसार ’जोशे जवानी’ होना चाहिए), पीरियेड्स, सेक्स लाइफ, रेसिपीज़ जैसे लगभग पौने दो सौ वीडियो और खबरें थीं लेकिन उनमें भी असम में मरने वालों के लिए कोई जगह नहीं थी।

लेकिन बीबीसी हिन्दी डाॅट काॅम के होम पेज पर चार बजकर 56 मिनट पर तीसरी बड़ी खबर असम में मरने वालों के बारे में थी। ये असम के हालमीरा चाय बगान से सीधे मंगाई गई रिपोर्ट थी। इतना ही नहीं बीबीसी ने शाम सात बजकर 20 मिनट तक असम में मर रहे लोगों से जुड़ी इस खबर को अपने होम पेज से हटाया नहीं थी, उस वक्त तक ये नवीं खबर थी। बीबीसी ने 24 फरवरी को भी असम से जुड़ी एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। सिफ बीबीसी पर ही क्यों थी असम की रिपोर्ट, क्या हम में से कोई इस पर सोचने का कष्ट करेगा।

इतना सब लिखने का मतलब किसी की नकारात्मकता को पेश करना कतई नहीं है, बात सिर्फ इतनी सी है कि हिंदुस्तानी मीडिया के पूर्वाग्रह ऑनलाइन मीडिया में तो कम से कम, कम ही होने चाहिए कि ये मीडिया वैश्विक है, इसकी पहुंच दुनिया के हर हिस्से में है जहां जहां इंटरनेट है, तो वहां वहां कम से कम हमारे पूर्वाग्रह न जाएं तो हमारे लिए बेहतर होगा और जाहिर है कि सिविल सोसाइटी के लिए भी।

रश्मि अस्थाना

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