सिर्फ जुए और शराब तक सीमित होती दीवाली

दीवाली मनाने का तरीका अब तेजी से बदल रहा है जिसे देख कई बार तो ऐसा लगता है कि इस से जुड़े तमाम मिथक और पौराणिक किस्से कहानियां वाकई झूठे हैं। सच और शाश्वत है तो जुआ और शराब जिन के शौकीनों की संख्या में हर साल इजाफा हो रहा है।

बात, दरअसल, सच भी इस लिहाज से है कि अधिकांश लोगों को समझ आ गया है कि लक्ष्मीपूजा तो मजबूरी है लेकिन असली लक्ष्मी, जो जुए के जरिए आती है (दरअसल जाती ज्यादा है), का रोमांच ही अलग है।

जुआ दीवाली का धार्मिक शगुन है जिस में अपने अपने समय को आजमाने का लालच बिरले ही छोड़ पाते हैं और जो छोड़ देते हैं वे सभ्य और आधुनिक समाज की निगाह व विश्लेषण में पिछड़े और परंपरावादी होते हैं। पर यह शगुन कब अपशगुन और ऐब में बदल जाता है, इस का एहसास जब होता है तब तक सेहत, प्रतिष्ठा और पैसों का काफी नुकसान हो चुका होता है।

बदलते मायने 

दीवाली के त्योहार के मायने कभी वाकई सामाजिक सौहार्द्र और उल्लास के हुआ करते थे जिसमें नए कपड़े पहनना, आतिशबाजी चलाना, पकवान खाना खिलाना और एकदूसरे से रूबरू हो कर बधाइयां देना एक अनिवार्यता हुआ करती थी।

अब यह सब जरूरी नहीं रहा है, बल्कि लक्ष्मीपूजन भी लोग एक रिवाज सा निभाने के लिए करते हैं। यह ज्ञान प्राप्त हो जाना एक अच्छी बात है कि लक्ष्मी पूजापाठ से नहीं, बल्कि मेहनत से आती है लेकिन यह अज्ञान कि दीवाली पर जुआ खेलने से सालभर पैसे की स्थिति का अंदाजा लगेगा, बहुत खतरनाक और नुकसानदेह है, जिस से हर साल करोड़ों पेशेवर जुआरी पैदा होते हैं।

तो क्या वाकई दीवाली के मायने सिर्फ जुए और शराब तक सीमित हो कर रह गए हैं, इस सवाल का जवाब बेहद निराशाजनक तरीके से हां में ही निकलता है।

चीयर्स डेस्क 

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