सस्ती कच्ची के आगे कौन पूछे मंहगी देशी

ऐसी कौन सी मजबूरी है कि गांवों के लोग कच्ची शराब पीने में ज्यादा रुचि दिखाते हैं जबकि गावों में  देशी शराब भी उपलब्ध होती है। पीने के शौकीन लाइसेंसी शराब क्यों नहीं पीते। आबकारी विभाग के जानकार बताते हैं कि स्थानीय स्तर पर गुड़, महुआ और चावल आदि के खमीर के साथ यूरिया आदि मिलाकर जो कच्ची शराब बनाई जाती है, उसमें मुनाफा भी जोड़ लिया जाए तो भी उसकी उत्पादन लागत प्रति बोतल 20-30 रुपए तक ही आती है। ये बोतल 40 में मिल जाए या 50 रुपए में, तो भी लाभ ही लाभ है। फिर इसके साथ कुछ मिथक भी जुड़े हैं।

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दूसरी तरफ लाइसेंसी देशी शराब की बोतल का औसत उत्पादन लागत 350 रुपए है। दोनों शराबों के दाम में इतने बड़े अंतर को कौन ग्रामीण झेले और क्यों, जबकि देशी शराब की तीव्रता, कच्ची शराब की तीव्रता से अलग होती है। अवैध रूप से बनी इस कच्ची शराब की तीव्रता सरकारी लाइसेंसी दुकान में बिकने वाली देशी शराब 36 और 42 प्रतिशत तीव्रता वाली शराब से कम होती है। देशी लाइसेंसी शराब का एक पउवा 65 से 70 रुपए में मिलता है। जबकि गांव में बनी अवैध कच्ची का पउवा 10 से 15 रुपए का मिलता है। कच्ची के दो पउवे भी लाइसेंसी देशी के मूल्य से कम के होते हैं।

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लखनऊ के आस पास के गांवों के कुछ शराब उपभोक्ताओं ने नाम न छापने की शर्त पर चीयर्स डाॅट काॅम को बताया कि देशी लाइसेंसी शराब की तीव्रता उतनी नहीं होती है जितनी बोतल पर लिखी होती है। क्योंकि उत्पादन लागत से दो गुने से अधिक की धनराशि टैक्स के रूप में चुकाने के बाद जो देशी शराब बाजार में बिक्री के लिए मिलती है, उसकी गुणवत्ता घोषणा के अनुरूप हो ही नहीं सकती। ये बात ठेकेदार सभी को स्वयं बताता है। इसलिए लोग कच्ची की तरफ चले जाते हैं। इन लोगों के अनुसार देशी शराब की स्वीकार्यता दिन पर दिन इसीलिए कम होती जा रही है।

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अगर देशी की लाइसेंसी दुकानों से 36 व 42 प्रतिशत तीव्रता वाली शराब सस्ती बिकने लगे तो फिर कोई अवैध रूप से बिक रही कच्ची शराब क्यों पिएगा। लेकिन देशी पर टैक्स इतना अधिक है कि अपनी खराब गुणवत्ता के बावजूद इतने अधिक दामों पर बिकना उसकी मजबूरी है।

कच्ची शराब के साथ कुछ मिथक भी जुड़े हैं जो इसके उत्पादन को समाप्त नहीं करने दे रहे हैं। गांवों में वे लोग जो सम्पन्न हैं, और अंग्रेजी भी पीने के लिए सक्षम हैं, वे भी महुवे की कच्ची शराब तैयार करवाते हैं और सर्दियों में उसका नियमित सेवन करते हैं। इनमें से अधिकांश का कहना है कि अगर इसमें यूरिया आदि न मिलाया जाए तो ये स्वास्थ्य वर्धक होने के साथ साथ शुद्ध और ऑर्गेनिक भी है।

चियर्स डेस्क

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