समुद्र क्या बुझा पाएगा हमारी प्यास

भारत में जल संकट विकराल रूप लेता जा रहा है इसका ताज़ा उदाहरण चेन्नई का जल संकट है जहाँ सरकार को जल आपूर्ति के लिए ट्रेन तक बुलानी पड़ गई। इसी सिलसिले में  राज्यसभा में पिछले दिनों चेन्नै के जल संकट का मामला उठा। इस बात पर चिंता जताई गई कि समुद्र किनारे बसा होने के बावजूद यह शहर प्यास से बेहाल है। यही हाल देश के कई और शहरों का है। केंद्र सरकार के मुताबिक, आज की तारीख में देश के 255 जिले पानी के लिए तरस रहे हैं। हालात को देखते हुए सुझाव दिए जा रहे हैं कि सरकार को तटीय इलाकों में जल संकट दूर करने को समुद्र के खारे पानी को मीठे पानी में तब्दील करने के लिए शिद्दत से कमर कस लेनी चाहिए।

अब सवाल है कि यह कदम कितना कारगर होगा और समुद्री जीवों और पर्यावरण पर इसका क्या असर पड़ेगाध् जहां तक चेन्नै का सवाल है, तमिलनाडु सरकार ने शहर का जल संकट दूर करने के मकसद से समुद्र के पानी को मीठे जल में तब्दील करने के लिए दो प्लांट लगाए हैं। सरकार दो और बड़े प्लांट लगाने पर विचार कर रही है। गुजरात ने भी पानी की समस्या का समाधान करने के लिए राज्य के कई इलाकों में खारे पानी को साफ करने के प्लांट लगाने का फैसला किया है। विशेषज्ञ कहते हैं कि समुद्र के पानी को रिवर्स ऑसमोसिस (आरओ) तकनीक से मीठे पानी में बदला जा सकता है। इस्राइल अपनी पानी की जरूरतों को इसके जरिए पूरा कर रहा है। अमेरिका और अन्य कई देश भी ऐसा कर रहे हैं।

गायब होने लगीं मछलियां
कई विशेषज्ञों का कहना है कि आरओ तकनीक से समुद्र के पानी को साफ करने से बचे हुए पानी में साल्ट्स की मात्रा बहुत बढ़ जाती है। इस पानी को जब वापस समुद्र में डाला जाता है तो उसके खारेपन में और बढ़ोतरी हो जाती है। यह पानी कई किस्म की मछलियों और अन्य जलीय जीवों के लिए एक बड़ा खतरा है। ज्यादा खारा पानी मछलियों द्वारा खाई जाने वाली कई समुद्री वनस्पतियों के वजूद पर भी संकट पैदा कर सकता है। चेन्नै में आरओ प्लांट से समुद्र का पानी साफ किए जाने के बाद से वहां के मछुआरे तटीय इलाकों से कई किस्म की मछलियों के गायब होने की शिकायत कर रहे हैं। इसके साथ ही पानी को साफ करने के लिए बनाए जाने वाले प्लांट्स की कीमत भी एक मुद्दा बन रही है। चेन्नै में बने 100 एमएलडी के एक प्लांट पर 900 करोड़ रुपये का खर्च आया है। इन्हें चलाने पर बिजली भी बहुत खर्च होती है।

आरओ का पानी कितना सही
आरओ के पानी को सेहत के लिए ठीक नहीं माना जाता। यह तकनीक पानी तो साफ कर देती है, लेकिन उसमें घुले हुए कैल्शियम, मैगनीज, कॉपर, जिंक, सोडियम, पोटेशियम आदि को भी अलग कर देती है। इससे शरीर को ये पोषक तत्व नहीं मिल पाते। चेन्नै में बना एक आरओ प्लांट साफ होने के बाद इन तत्वों को फिर से जरूरी मात्रा में पानी में मिलाता है।

फ्लोटिंग आरओ प्लांट लगाएं
जेएनयू के यूनिवर्सिटी साइंस इंस्ट्रूमेंटेशन सेंटर के प्रमुख डॉ. सतेंद्र शर्मा कहते हैं कि आरओ तकनीक जल संकट से निजात दिला सकती है। इसके लिए बिजली की जरूरत सोलर पावर से पूरी कर सकते हैं। आरओ के पानी को जमीन में डालने से उसकी क्वॉलिटी खराब होने का खतरा रहता है। इसके लिए सरकार इस्राइल की तर्ज पर फ्लोटिंग आरओ प्लांट्स लगा सकती है।

चीयर्स डेस्क 

loading...
Close
Close