संस्कृति के नाम पर खुलेआम बिक रही महुए की शराब

छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में  संस्कृति के नाम पर बस्तर में आदिवासियों को महुए की शराब बनाने व पीने की छूट दी गई है लेकिन इस छूट ने बिज़नेस का रूप ले लिया है। जिसके चलते जिला मुख्यालय के आसपास के करीब 100 गांव में प्रतिदिन 15 हजार लीटर महुए की शराब तैयार की जा रही है और इसके लिए लगभग 600 क्विंटल जलाऊ खपाई जा रही है। एक तरफ जहाँ वन विभाग कटाई रोकने में सफल नहीं हो पा रहा है वहीं दूसरी तरफ आबकारी विभाग भी गावों में शराब का कुटिर उद्योग बंद नहीं करवा पा रहा है।

सैकड़ों घरों में बनती है शराब 

एक सर्वे के अनुसार यहां के 75 प्रतिशत ग्रामीण बस्तियों में शराब बनती है। प्रत्येक गांव में कम से कम 30 प्रतिशत घरों में महुआ की शराब बनाई जाती है। बताया गया कि अधिकांश ग्रामीण स्वयं के लिए नहीं अपितु बेचने के लिए बड़ी मात्रा में शराब बनाते हैं। आसवन विधि से महुआ की शराब बनाने के लिए ग्रामीण बड़ी मात्रा में पानी का उपयोग तो करते हैं वहीं शराब भट्ठियों में सैकड़ों क्विंटल जलाऊ भी झोंकते हैं। इस लकड़ी की आपूर्ति आसपास के जंगलों से हो रही है। बताया गया कि पांच लीटर शराब बनाने के लिए कम से कम 20 किलो जलाऊ लगती है। हर गांव में लगभग 30 घरों में शराब बनती है। इस हिसाब से प्रतिदिन लगभग छह क्विंटल जलाऊ खप जाती है। शहर के आसपास के 90 प्रतिशत ग्रामीण बस्तियों में रोज शराब बनाई जाती है। वहीं शहर के आमागुड़ा, पथरागुड़ा, कुम्हारपारा, हाटकचोरा, मेटगुड़ा, गांधीनगर वार्ड, बहादुरगुड़ा, धरमपुरा, कंगोली, तेतरखूंटी बस्तियों में भी महुआ की शराब तैयार की जाती है। बताया गया कि जगदलपुर ब्लॉक के ग्रामीण माचकोट, दरभा, बकावंड और बस्तर रेंज के जंगलों से जलाऊ लाते हैं या वहां के ग्रामीणों से जलाऊ खरीदते हैं और घरों में शराब बनाते हैं।

रोज बनाई जा रही 15 हजार लीटर शराब

शहर के चारों तरफ के करीब 100 गांवों में बनने वाली महुआ की शराब शहर पहुंचाई जाती है। आबकारी विभाग के सूत्रों के अनुसार जगदलपुर शहर में ही प्रतिदिन लगभग पांच हजार लीटर महुआ की शराब पहुंचती है। शहर के लगभग 20 वार्डों और झोपड़पट्टी में इन्हें बेचा जाता है। इसके अलावा गांवों में भी जमकर महुए की शराब बिक रही है। बताया गया कि प्रतिदिन 100 गांवों के लगभग तीन हजार घरों में औसतन 15 हजार लीटर शराब बनती है और इसके लिए 60 क्विंटल जलाऊ फूंक दिया जाता है। वन अधिकारी बताते हैं कि महुआ की शराब बनाकर बेचने की छूट बिल्कुल नहीं है। इसके बावजूद आबकारी और पुलिस प्रशासन शराब बेचने वालों के खिलाफ कभी सख्त हो कार्रवाई नहीं कर पाई। इसके चलते ही शहर की अंग्रेजी शराब गांव में और गांव का महुआ की शराब शहरों में बिकने लगा है।

कार्रवाई से बचता वन विभाग 

महुआ की शराब बनाने के लिए भारी मात्रा में पेड़ काटे जाने के संदर्भ में वन कर्मियों का कहना है कि जंगलों में लकड़ी काटने पहुंचे ग्रामीणों को पकड़ने पर कई स्थानीय जनप्रतिनिधि ही कार्रवाई का विरोध करते हैं। कई बार पेशेवर लकड़ी चोरों द्वारा वन कर्मियों को आदिवासी एक्ट के तहत कानूनी पचड़ों में फंसाने का भी कई मामला सामने आया है, इसलिए वनकर्मी भी इस विवाद से बचने कथित ग्रामीणों के खिलाफ वांछित कार्रवाई नहीं कर पा रहे हैं।

चीयर्स डेस्क 

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