शहरीकरण भेंट चढ़ी गोमती नदी

गोमती नदी यूपी की प्रमुख नदियों में से एक है और गंगा की एक सहायक नदी है। हिन्दु पुराणों के अनुसार गोमती को ब्रह्मर्षि वशिष्ठ की पुत्री माना गया है। कहा जाता है की एकादशी पर गोमती नदी में स्नान करने से सारे पाप धुल जाते है। श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार हिंदू धर्म के प्रमुख धार्मिक कार्यों को संपन्न करने के लिए गोमती नदी भारत की अनुकरणीय नदियों में से एक है। 

गोमती 950 किमी का सफर तय करते हुए यूपी के वाराणसी जिले से 27 किलोमीटर दूर सैयदपुर, कैठी के पास गंगा से मिलती है, इसका उद्गम पीलीभीत जनपद के माधोटान्डा कस्बे में होता है। कस्बे के मध्य में फुलहर झील है जिसे “फुल्हर ताल” या “गोमत ताल” कहते हैं, वही इस नदी का स्रोत है। सीतापुर जिले में यह कठीना सहायक नदी से मिल कर एक पूर्ण नदी का रूप ले लेती है। जौनपुर के पास गोमती में एक प्रमुख सहायक साई नदी शामिल हो जाती है।

लखनऊ में बहते इस नदी में, शहर के 25 नालों का पानी और अपशिष्ट जल व सीवेज इस नदी में जाता है। नदी में विभिन्न शहरों और औद्योगिक इकाइयों का गंदा-पानी और औद्योगिक अपशिष्ट भी बहता रहता है। चीनी मिलों, घरेलू कचरा और सीवेज और औद्योगिक कारखानों के कचरे के कारण यह नदी प्रदूषित हो चुकी है। सरकार भी मानती है कि गोमती में प्रदूषण का स्तर बढ़ा है। इसकी सहायक नदियां भी इसके प्रदूषण को बढ़ाती रहती है। लखनऊ में इस नदी की हालत सबसे ज्यादा खराब है।

शहरीकरण भेंट चढ़ी गोमती नदी

विशेषज्ञों का कहना है कि गोमती में बहने वाला कचरा सीधे तौर भूमिगत जल की क्वालिटी को प्रभावित करता है और कई अशुद्धियां तो ऐसी हैं, जिन्हें कोई प्‍यूरिफायर भी अलग नहीं कर सकता। नदी विशेषज्ञ डॉ़ वेंकटेश दत्ता कहते हैं-यह एक  प्राकृतिक प्रक्रिया है कि नदी भूजल को रिचार्ज करती है और भूजल से अपनी सतह रीचार्ज करती है। नदी का गंदा पानी भूजल के साफ पानी को मैला करता है। लिहाजा नदियों का साफ होना बेहद जरूरी है।

डॉ वेंकटेश दत्ता कहते हैं कि 2006 के बाद से ही इसके पानी में हैवी मेटल्स के लक्षण दिखने शुरू हो गए थे। इसकी एक वजह यह है कि गोमती के फ्लो में कमी हुई। उद्योगों के ऐसे वेस्ट जिनमें हैवी मेटल्स थे, वह नदी में सीधे जा रहे थे। कम पानी की वजह से हैवी मेटल्स का नदी में कंसन्ट्रेशन बढ़ता गया। लेकिन जहां आवश्यकता हो वहां इफ्ल्यूएंट ट्रीटमेंट प्लांट (ईटीपी) लगवाए जाने चाहिए। गोमती के मैला होने में एक बड़ी चिंता इस बात की है कि लखनऊ के भूजल को रीचार्ज करने का सबसे बड़ा माध्यम है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो जल्द ही लखनऊ वालों को भी पीने के पानी की समस्या का सामना करना पड़ सकता है।

चीयर्स डेस्क 

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