शराब, समाज और निर्देश!

क्या शराब पीना खराब है? क्या शराब का प्रचार-प्रसार करना समाज पर अनुचित प्रभाव डालता है? और क्या देश में लोग अब बहुत शराब पीने लगे हैं ? ये सवाल अखबारों में   छपी एक खबर को पढ़कर उठा। ये खबर थी कि शासन ने हाईकोर्ट द्वारा प्रदेश में शराब (मादक वस्तुओं) के प्रचार और विज्ञापन पर रोक लगाने के आदेशों का कड़ाई से पालन करने के निर्देश दिया है। सरकार का ये निर्देश भी तब जारी हुआ है, जबकि देश के किसी भी अखबार, पत्रिका और न्यूज न्यूज चैनल पर शराब, बीयर या वाइन का विज्ञापन नहीं दिखाया जाता।

फिर क्यों यूपी सरकार ने ऐसा आदेश जारी किया। यह सोचना शुरू किया तो शराब के इतिहास से लेकर उसे पीने और पिलाने वालों के तमाम तमाम किस्से याद आ गए। पैतीस साल पहले का वो समाज जहन में उभरा जहां शराब सिर्फ पुरुष ही पीते थे। बड़े कारोबारी  और राजनीतिक परिवारों की महिलाएं अपने घर की पार्टियों में चोरी छुपे वाइन पीती थी। कालेज और यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे युवक इससे दूर ही रहते थे। क्योंकि उनके पास एक तो पैसे कम होते थे, दूसरे तब शराब और बीयर पीना खराब माना जाता था। ऐसे में उन्हें   शराब या बीयर पीने पर पकड़े जाने का डर रहता था। तब के इस माहौल में सरकारी और  गैर सरकारी आयोजनों में, साहित्यकारों और नेताओं की बैठकों में खानपान का जो प्रबंध  होता था, उसमें नानवेज नही होता था। न चिकन, न मटन और न शराब और न बीयर। ये सिलसिला मंडल और मंदिर के शरू हुए दौर में टूटा।

इस दौर ने देश के हर वर्ग को झंझोड़ा। लोगों में अपनी लीक को तोड़ने की हिम्मत हुई।    तो बाजार बदला, समाज बदला। खानपान का तरीका भी बदला। नेताओं की पार्टियों में  शराब-बीयर की पैठ हुई। बिजनेस पार्टियाँ छककर शराब और बीयर पीने के बाद ही खत्म  होने  लगी। शराब और बीयर नये ब्रांड देश में आये। और घरों पर किसी को खाने पर बुलाने के लिए उसके लिए नॉन वैज व ड्रिक्स का प्रबंध करना जरूरी होने लगा, वरना खाने पीने  वाले उसे खाना ही नहीं मानते थे। उन दिनों आम तौर पर शादियों में शराब और मांसाहार नहीं मिलता था। फिर अपने जैन व ब्राह्मण दोस्त भी शादी के कुछ दिन पहले परिवार के बुजुर्गो से छुप कर विशेष दावतें देने लगे जिनमें खुलकर शराब व मांसाहार चलता था।

मुझे याद है कि एक बार मेरे एक गुरुतुल्य पत्रकार को पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कांग्रेंस कवर करने वाले पत्रकारों को खाने पर बुलाया। तो मुझे भी अपने साथ ले गए। उन दिनों प्रणव दा कांग्रेस पार्टी में ही थे। जबरदस्त ठंड पड़ रही थी। पत्रकारों ने आग तापते   हुए काफी देर तक कुछ आने का इंतजार किया। जब गिलास नहीं आए तो वे आपस में  चर्चा करने लगे और फिर एक पत्रकार ने बहुत हिम्मत करके बेशर्मी के साथ उनसे पूछ ही लिया कि दादा दारू कहां है? इतनी सर्दी में हम सबकी हालत खराब हो रही है।

गुस्से के कारण प्रणव मुखर्जी का चेहरा लाल हो गया और उन्होंने उसे लगभग डांटते हुए  कहा कि यह कोई ठेका नहीं है। जिसे खाना खाना हो खाए वरना अपने घर जाए। मुझसे  आज के बाद ऐसी बात नहीं करना। सब पत्रकार घबरा गए और चुपचाप खाना खाकर वहां   से खिसक लिए। इसके बाद हमें लखनऊ में ऐसे वाकये आये दिन देखें मंत्री आवास में   देखेंने को मिले। बीजेपी, सपा और लोकतांत्रिक कांग्रेस पार्टी के तमाम मंत्रियों के आवास पर आये दिन शराब पार्टी होती थी। अभी भी ये सिलसिला चल रहा है। नौकरशाह भी इसमें शामिल हैं। इन्हें भी नेताओं की तरह पत्रकारों के साथ शराब का आनंद लेने में  आनंद मिलता है। और ये नौकरशाह यूपी में किसी सरकार को भी शराबबंदी की सलाह नहीं देते। जब किसी नेता ने यूपी में शराबबंदी करने की बात की तो यूपी के नौकरशाहों ने सत्ता पर काबिज मुखिया को यही समझाया कि शराबबंदी करने से सूबे का पर्यटन  कारोबार प्रभावित होगा और सरकारी राजस्व का नुकसान होगा।

सूबे के एक अपर मुख्य सचिव ने कुछ माह पहले शराब की चुस्की लेते हुए एक रोचक  किस्सा सुनाया था कि कैसे उन्होंने यूपी में शराबबंदी को लेकर सरकार की सोच को पूरी तरह से बंद करवाया। उनके अनुसार देश के सबसे रईस उद्योगपति ने अपने बेटे की शादी अपने राज्य गुजरात में महज इस लिए नहीं रखी क्योंकि वहां नशाबंदी के कारण मेहमानों   को शराब नहीं परोसी जा सकती थी। इसे लेकर एक अखबार में रिपोर्ट भी छपी थी कि गुजरात में पर्यटन होटल कारोबार से जुड़े शाही परिवार के लोग चाहते हैं कि गुजरात में नशाबंदी खत्म हो। उनका कहना था कि नशाबंदी के कारण गुजरात का पर्यटन बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है। इन लोगों ने गुजरात में इस कानून में ढील दिए जाने की मांग की।  अपर मुख्य सचिव के मुताबिक यह बात फिक्की महिला संगठन के अहमदाबाद चैप्टर के पर्यटन पर आयोजित सम्मेलन में महारानी राधिका राजे गायकवाड़ ने कही जो कि पर्यटन   के धंधे में हैं। वडोदरा स्थित उनके लक्ष्मी विलास महल से एक रईस उद्योगपति के बेटे    का विवाह होना था। सम्मेलन में महारानी राधिका ने कहा था कि हर महोत्सव में एल्कोहल की अपनी अहमियत होती है और देश के सबसे रईस उद्योगपति ने महज इस पर प्रतिबंध  के कारण यह जगह छोड़ दी वरना यहां बेहतरीन सुविधाएं व सेवाएं उपलब्ध थीं।

फिक्की के इस सम्मेलन में यह भी कहा गया कि नशाबंदी के कारण गुजरात में पर्यटन कारोबार बहुत ज्यादा प्रभावित हो रहा है। राज्य के मारवाडि़यो व जैनियो के अलावा वहां   कोई अन्य शादी नहीं करता है। हम उन विदेशियों को कैसे आकर्षित करे जो कि हाथ में  बीयर का गिलास लेकर बात करते हैं। गुजरात में नशाबन्दी को लेकर समाज की ये सोच  उक्त अपर मुख्य सचिव में सूबे के सीएम को बताया उसके बाद राज्य में शराबबंदी को  लेकर कोई विचार नही हुआ। जबकि यूपी के पड़ोसी बिहार में शराबबंदी लागू है।

खैर आज भले ही देश और प्रदेश में शराब सेहत के लिए खराब मानी जाती हो पर इसका  दुनिया में अपना ही महत्व है। कहा जाता है कि दुनिया का सबसे पुराना पेशा वेश्यावृति व सबसे पुराना पेय शराब है। इस्लाम, जैन, बौद्ध व सिख धर्म में भले ही इसके सेवन पर रोक लगी हो मगर सच्चाई कुछ और ही है। माना जाता है कि ईसा से हजारों साल पहले दुनिया  में शराब उपलब्ध थी। आज से 2000 साल पहले ग्रीस से इसे शहद व पानी से बनाते थे।   दो सबसे पुराने ग्रंथो रामायण व महाभारत में शराब का जिक्र मिलता है। करीब 1700 ईसा पूर्व लिखे गए ऋग्वेद में भी शराब का जिक्र मिलता है। आयुर्वेद में तो इसका इस्तेमाल  त्वचा व शरीर को सुन्न करने के लिए किया जाता था। हिंदू धर्म में यह सुरा व सोमरस के नाम से मशहूर थे इसे चावल गेहूं, गन्ने, अंगूर व फलों से तैयार किया जाता था।

इतिहास बताता है कि युद्ध करने वाले क्षत्रिय फलों से तैयार शराब पीते थे जबकि किसान अपने समारोहों में इसका सेवन करते थे। इंद्र को तो शराब विशेष रूप से पसंद थी। शिव   पर तो नशे के उनके शौक के कारण धतूरा व भांग चढ़ाई जाती है। सुश्रुत संहिता में तो सोमरस की विशेषताएं में कहा जाता है कि सोम नामक पेड़ के मीठे रस से तैयार शराब    को पीकर ब्राह्मण सीधे देवताओं से जुड़ जाते थे उन्हें दैवीय शक्ति हासिल हो जाती थी। शुक्रदेव को तो सुरा विशेष रूप से पसंद थी। असुरो के इस गुरू के कारण ही हिंदुओं में सुरा  व सुंदरी नामक मुहावरा प्रचलित हुआ।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र के मुताबिक मौर्य शासनकाल में शराब पर टैक्स लगाकर राजस्व एकत्र किया जाता था। वाल्मिकी रामायण के मुताबिक जब सीता वनवास से वापस अयोध्या लौटी थी तो उन्होंने गंगा नदी पर 1000 लोटे सुरा व मीट के साथ पकाया गया चावल  चढ़ाया था। भारत के मुगलों व अंग्रेंजो के शासन काल में भी शराब का सेवन काफी तेजी    से बढ़ा। बाबर शराब नहीं भांग का नशा करता था। कई बार तो वह इतना नशा कर लेता   कि कई दिन दरबार ही नहीं आ पाता था। अकबर भांग खाता पर उसने विदेशियों को शराब पीने की छूट दे रखी थी। शाहजहां शराब पीता था, जबकि उसका बेटा औरंगजेब शराब को  हाथ भी नहीं लगाता था। मगर उसकी बहन जहांआरा शराब पीती थी। इस देश में पुर्तगाली शासन के दौरान गोवा व महाराष्ट्र में काजू के फल से फैनी बनाना सीखा गया, क्योंकि उनके यहां इसी से शराब बनाई जाती थी।

जब ब्रिटेन ने अपना उपनिवेशवाद फैलाया तो वे बियर बनाने वाले हाप्स लेकर आए। उन्होंने शराब बनाने वाली टोडी पर कर लगाया। हमारे देश में आंध्र प्रदेश, बिहार, गुजरात मणीपुर, केरल व नगालैंड में नशाबंदी पर रोक है मगर वहां क्या होता है सबको पता है। पाकिस्तान  तो इस्लामी देश है जहां कानूनन मुसलमानों के शराब पीने व खरीदने पर रोक है। वहां  एशिया की सबसे प्रसिद्ध मरी डिस्टलरी है जिसकी चार शाखाएं हर तरह की शराब बनाती है। पहले इसके मालिक जलियावाला कांड के खलनायक डायर का पिता था। अब इसके मालिक इसफनयार भंडारा है जो कि पारसी है। वे दुनिया की एकमात्र 20 साल पुरानी माल्ट व्हिस्की बनाते है जिसका नाम रेयरस्ट माल्ट व्हिस्की है। वहां की 97 फीसदी जनसंख्या मुसलमान   है जो कि शराब पीना तो दूर रहा खरीद भी नहीं सकता है। भंडारा के मुताबिक उनकी 97 फीसदी शराब मुसलमान ही खरीदते हैं। इस्लाम में शराबी मुसलमान को 80 कोड़े मारने की सजा है जोकि आज तक वहा किसी को नहीं मिली। इस इस्लामी देश में आतंकवादियों के हावी रहते शराब पानी की तरह पी जाती है। जबकि वहां कानून गैर इस्लामी ही शराब खरीद सकते हैं। वहां विदेशियों और गैर- इस्लामियों के लिए जगह-जगह दुकानें हैं और होटल में आराम से शराब मिल जाती है।

ये तो हुई शराब के इतिहास की बातें, अब बात करते है अपने समाज की। नेशनल ड्रग  डिपेंडेंस ट्रीटमेंट (एनडीडीटीसी) ने अपनी हालिया रिपोर्ट में बताया है कि देश के करीब 16 करोड़ लोग शराब पीते हैं। छत्तीसगढ़, त्रिपुरा, पंजाब, अरुणाचल प्रदेश और गोवा में शराब   का सबसे ज्यादा सेवन किया जाता है। इसमें भी 30 फीसदी लोग देसी शराब का इस्तेमाल करते हैं। इस रिपोर्ट में ये बात भी सामने आई है कि देश का ऐसा कोई राज्य नहीं जहां की महिलाएं शराब न पीती हों। हर 16 में से एक महिला को शराब की इतनी लत लग चुकी है कि वो शराब के बिना रह नहीं सकती है। वहीं, पुरुषों में ये आंकड़ा 5 में से 1 है। वैसे महिलाओं के शराब पीने के मामले में अरुणाचल प्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्य टॉप पर हैं।  और यूपी में 2019-20 के शुरुआती चार महीनों (अप्रैल से जुलाई) में सबसे ज्यादा देसी  शराब की खपत हुई। यूपी की दुकानों से इस दौरान 16.43 करोड़ बल्क लीटर देशी शराब   की बिक्री हुई। पिछले साल इन्हीं चार महीनों में 13.51 लाख बल्क लीटर देशी शराब बिकी थी। यानी देसी शराब की बिक्री में 21.6 फीसद का इजाफा हुआ। इस अवधि में प्रदेश में 7.41 करोड़ बोतल (750 एमएल) अंग्रेजी शराब की बिक्री हुई, जो पिछले साल हुई 6.29 करोड़ बोतल की बिक्री से 18ः ज्यादा रही। वहीं, 19.38 करोड़ बोतलें बीयर की बिकीं, जो पिछले साल हुई 16.59 करोड़ बोतलों की बिक्री से 16.8 फीसदी ज्यादा है।

शराब सेवन के सर्वे और शराब बिक्री के आंकड़ों को देख कर कुछ समय पहले ही बीजेपी में शामिल हुए नरेश अग्रवाल का एक कथन याद आ गया। नरेश ने देश के उच्च सदन में कहा था कि भगवान राम को रम पसंद है। उन्होंने शराबियों के बीच एक प्रचलति एक कविता की चंद लाइनें सदन में पढ़ी थी। तो सदन में हंगामा हुआ और उन्होंने अपने कहे    पर खेद व्यक्त किया। तब कहीं जाकर मामला शांत हुआ। ऐसे में अब ये सवाल है कि   जिस देश में काशी के भैरव मंदिर से लेकर दिल्ली के पुराना किला स्थित भैरव मंदिर में शराब चढ़ती हो वहां शराब के विज्ञापन करने से रोक लगाने के निर्देश जारी कर क्या लोगों को शराब से कितना दूर ले जाया जा सकेगा। या शराब से लोगों को दूर ले जाने के कोई  नया  तरीका तलाश करना होगा।

राजेंद्र कुमार 

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