शराब कंपनियों पर मेहरबान सरकारें

सरकार एथनॉल के सहारे पर्यावरण प्रदूषण से निजात पाने और घरेलू शुगर इंडस्ट्री को चीनी उत्पादन का विकल्प देने की पुरजोर कोशिश में जुटी है। लेकिन कुछ राज्यों की प्रथमिकता प्रदूषण से ज्यादा सिर्फ राजस्व है। राज्य सरकारों की राहत का असर है कि एथनाल के घरेलू उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा हर साल शराब कंपनियां गटक रही हैं।

मेहरबान सरकारें 

यूपी और तमिलनाडू में तो सरकारें शराब कंपनियों पर मेहरबान हैं, तमिलनाडु में तो पूरे का पूरा शीरा शराब कंपनियों को बेचना पड़ता है तो वहीं यूपी में शराब कंपनियों के लिए शीरे का 16 फीसद हिस्सा आरक्षित कर दिया गया है जो पहले 12.5 फीसद था। यानी प्रोत्साहन एथनॉल उत्पादन बढ़ाने को दिया जा रहा है और इसका पूरा फायदा शराब कंपनियां उठा रही हैं।

चालू वर्ष में राष्ट्रीय स्तर पर पेट्रोल में तय 40 फीसद के लक्ष्य के विपरीत 5.8 फीसद एथनॉल ही मिश्रित किया जा सका है। इसे वर्ष 2030 तक बढ़ाकर 20 फीसद करना है। बाजार में चीनी की भरपूर उपलब्धता से मुश्किलें झेल रही शुगर इंडस्ट्री को एथनॉल उत्पादन का विकल्प मिल गया तो क्रूड ऑयल इंपोर्ट घटाने में सहूलियत हो गई | इससे एक ही तीर से कई निशाने सध रहे हैं। केंद्र सरकार की प्राथमिकता एथनॉल के उपयोग को प्रोत्साहन देने की है। गन्ना उत्पादक राज्य और वहां स्थापित शुगर इंडस्ट्री सरकार की हरसंभव मदद कर रहे हैं। गन्ना किसानों और शुगर इंडस्ट्री की जगह शराब कंपनियों को कानूनी प्रावधान कर रियायती दरों पर शीरा मुहैया कराना केंद्र की नीतियों के पक्ष में तो नहीं हे सकता है।

भारत में चालू साल में एथनॉल का कुल उत्पादन 300 करोड़ लीटर हुआ, जिसमें से 110 करोड़ लीटर शराब बनाने वाली कंपनियों के खाते में चला गया, जबकि 30 करोड़लीटर एथनॉल केमिकल इंडस्ट्री को दिया गया। बचे हुए 160 करोड़ लीटर एथनॉल का उपयोग ही पेट्रोल में मिलाने में हुआ। केमिकल इंडस्ट्री अपनी बाकी जरूरतें आयातित एथनॉल से पूरी करती हैं। घरेलू उत्पादन के साथ भारत एथनॉल का आयात भी करता है। लेकिन घरेलू उत्पादन बढ़ने से पिछले साल ही एथनॉल आयात में 14 फीसद तक की कमी दर्ज की गई आयात घटकर 63.3 करोड़ लीटर रह गया है। भारत में आयात होने वाले कुल एथनॉल में अमेरिकी बाजार की हिस्सेदारी 94 फीसद है।

चीयर्स डेस्क

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