वे पानी को देवता नहीं मानते, उसकी कद्र करते हैं

स्विट्जरलैंड में पानी शुद्ध करने के लिए घरों में आरओ दिखाई नहीं देते। सब नल का पानी ही पीते हैं। नदियां और झीलें इतनी साफ हैं कि उनका तल दिखाई देता है। पिछले एक माह में हमने भारत में दो तरह की बातें देखीं। जैसे-जैसे गर्मी बढ़ी पानी के लिए भारी किल्लत का सामना करना पड़ा। कई जगहों से पानी के लिए मारपीट की खबरें भी आईं। दूसरी तरफ जब बारिश होने लगी तो बाढ़ के प्रकोप को हमने देखा। खेतों से लेकर सड़कें पानी से भरी नजर आईं।
इससे पता चलता है कि वर्षा से प्राप्त पानी के मैनेजमेंट की हमने कोई खास व्यवस्था नहीं की। वरना तो न पानी की कमी के कारण हाहाकार हो, न बाढ़ से तबाही हो। हाल ही में स्विट्जरलैंड के हाइड्रॉलजिकल कमिशन की रिपोर्ट पढ़ रही थी। इसमें पानी की स्थिति के बारे में 1901 से लेकर इस सदी के आखिर और अगली सदी तक की बातें की गई हैं। इसमें कहा गया है कि क्लाइमेट चेंज एक भारी चुनौती है। स्विट्जरलैंड एक छोटा सा देश है। इसकी आबादी मात्र सत्तर लाख है। यहां अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा पर्यटन पर निर्भर है। यूरोप के अन्य देशों की तरह यह भी एक ठंडा देश है लेकिन क्लाइमेट चेंज के कारण पिछले कुछ सालों से गर्मी से त्राहि-त्राहि कर रहा है।

इस देश में बड़ी-बड़ी झीलें और नदियां हैं। बारिश भी खूब होती है। अच्छे और बुरे पानी जैसी कोई बात भी नहीं है। पानी शुद्ध करने के लिए घरों में आरओ दिखाई नहीं देते। न ही बोतल बंद पानी का व्यवसाय नजर आता है। सब नल का पानी ही पीते हैं। नदियां और झीलें इतनी साफ हैं कि उनका तल दिखाई देता है। मछलियां तैरती दिखती हैं। पानी का नीलापन कायम है। कमिशन की रिपोर्ट में भी यही बात कही गई है कि यहां का पानी मिनरल वाटर की तरह ही शुद्ध है। इसे अलग से शुद्ध करने की जरूरत नहीं है। यहां का अस्सी प्रतिशत पीने का पानी भूजल है।

स्विट्जरलैंड में पानी की कोई कमी नहीं है। इसने अपने जल स्रोतों को संभाल और सहेजकर रखा है। लेकिन रिपोर्ट में माना गया है कि क्लाइमेट चेंज और बर्फ के पिघलने के कारण 2085 तक हालात काफी चुनौतीपूर्ण होंगे। इससे निपटने के लिए अभी से तैयारी करनी होगी। यहां 1980 से जगह-जगह पानी को शुद्ध करने वाले प्लांट लगाए गए हैं, जिससे उपयोग होने के बाद पानी को दोबारा इस्तेमाल किया जा सके। नदियों में साबुन बनाने में इस्तेमाल होने वाले फॉस्फेट्स के कारण प्रदूषण फैल रहा था, इसलिए साबुन उद्योग में इस केमिकल के उपयोग पर रोक लगा दी गई है। यहां की कई नदियां यूरोप के दूसरे देशों में भी जाती हैं और वहां की पानी की जरूरतों को पूरा करती हैं।

इसीलिए स्विट्जरलैंड को यूरोप का वाटर टावर कहा जाता है। नदियों, झीलों की साफ-सफाई पर पूरा ध्यान दिया जाता है। हमारी तरह नहीं कि नदियों से लेकर तालाब तक कूड़े और रसायनों के ढेर से पटे पड़े हैं। वहां भारत की तरह पानी को कोई देवता नहीं मानता, लेकिन पानी की कद्र और इज्जत करना जानते हैं। वहां चाहे जब बादल घिर आते हैं। काली घटाएं छा जाती हैं और तेज बारिश होने लगती है। मगर चाहे जितनी बारिश हो सड़कों पर पानी इकट्ठा नहीं होता। घरों में जिन लोगों ने अपने यहां इस्तेमाल किए गए पानी को शुद्ध करने के संयंत्र लगवा रखे हैं, उन्हें टैक्स में छूट मिलती है। पानी को मुफ्त का समझकर उसका फालतू इस्तेमाल न किया जाए, इसके लिए सरकार ने पानी सबसे महंगा कर रखा है। बिजली से भी ज्यादा महंगा।

जिस देश में न आबादी ज्यादा है, न पानी की कमी है, वह अपने पानी की बूंद-बूंद बचा सकता है तो हम क्यों नहीं बचा सकते। हमारी पुरानी ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं में जिस तरह से पानी बचाया जाता था उनकी तरफ फिर से लौटने की जरूरत है। अनुपम मिश्र ने जिस तरह से अपनी किताबों में राजस्थान के पानी बचाने के तौर-तरीकों का वर्णन किया है, वैसे तौर-तरीके पूरे देश में मौजूद हैं। अगली बारिश से पहले अगर उनको प्रयोग में लाया जाए तो पानी तो बचेगा ही बाढ़ की भीषणता भी कम होने लगेगी।

क्षमा शर्मा

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