यहां के लोग नहीं करते ‘गंगा’ से प्यार

यूपी के बलिया में मौजूद है हरिहरपुर गांव। इस गांव में रहने वाली रूपकली देवी गंगा से नफरत करती हैं क्योंकि वो अपने उजड़े हुए घर और परिवार की वजह गंगा को मानती है। रूपकली देवी को पता ही नहीं था कि उनका हैंडपंप पानी नहीं जहर उगल रहा है। वो जिसे पानी समझ कर पी रही हैं वो आर्सेनिक है. इस आर्सेनिक की वजह भी कहीं न कहीं गंगा ही है।

हरिहरपुर गांव के कमोबेश हर घर की यही कहानी है। गांव में रहने वाले राजेश दुबे बताते हैं कि हर साल पानी की वजह से 3-4 लोगों की मौत हो जाती है। गांव के हर दूसरे व्यक्ति को चमड़ी से जुड़ी हुई परेशानी है, हथेलियो पर उभरते छाले, और पैरों में उभरते फफोले जिसे गांव के लोग चित्ती उभरना मानते है और उसे चर्म रोग समझते है, उन्हें ये पता तक नहीं है कि वो कैंसर के मुहाने पर खड़े हुए हैं।

इसी गांव से थोड़ी दूर एक और गांव है उदवन छपरा। उदवन छपरा के रहने वाले पवन बताते हैं कि गांव में एक घर में प्रति दिन औसतन 40 रू पीने के पानी पर खर्च होते हैं।  गांव में तीन कुएं भी है जो काम कर रहे हैं लेकिन राजनीति और एकजुटता की कमी की वजह से उनकी देखरेख सही नहीं हो पा रही है। यहां तक की जागरूकता की कमी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि लोगों ने अपने हेंडपंप पर पानी निकालने वाली जगह पर कपड़ा बांध दिया है। उन्हें ऐसा लगता है कि ऐसा करने से पानी साफ हो जाएगा।

पानी से पनपा पानी का बाजार

आर्सेनिक मिला पानी निकलते हेंडपंप ने बाजार को एक नया कमाई का जरिया दे दिया है। बलिया के तमाम गांवों में आरओ वॉटर के व्यवसाय ने खासा जोर पकड के रखा है। यहां गांवं के अंदर ही कई प्राइवेट आरओ प्लांट लग गए हैं जिससे गांव के कई परिवार रोज 20 रू देकर 20 लीटर की बॉटल खरीदते हैं, देखा जाए तो एक परिवार औसतन 1200 रुपये महीना पीने के पानी पर खर्च कर रहा है।

यह पानी शुद्ध है या नहीं इस बात की भी कोई जांच नहीं हुई है। कुल मिलाकर यहां की जनता भगवान के भरोसे है. सरकार न तो खुद ही कोई पानी के इंतजाम कर रही है और न ही यहां धड़ल्ले से बगैर जांच के बिक रहे पानी पर कोई लगाम कसी गई है। गांव का बाशिंदा ये सोचकर वो पानी पी रहा है कि उसके हैंडपंप से निकले पानी से तो ये कम ही जहरीला होगा. गांव के हैंडपंपो पर खतरे के लिए लाल निशान तो लगा दिए गए हैं लेकिन उसके बदले में कोई इंत़जाम कहीं नजर नहीं आता. कहीं कोई आर्सेनिक निकालने वाला प्लांट किसी हेंडपंप पर लगाया भी गया है तो वो दस दिनों के अंदर ही चोक हो जाता है. उसके बाद न तो उसे लगाने वाले ठेकेदार को इसकी चिंता है न ही सरकार को. जनता कुछ दिनों तक ठीक पानी पीती है उसके बाद फिर उसकी किस्मत में जहर ही आ जाता है.

चीयर्स डेस्क 

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