लड़कपन में औरों की तरह ही थे बापू

मोहनदास करम चंद गांधी को महात्मा माना जाता है, उन्हें राष्ट्रपिता का दर्जा हासिल है। पूरी दुनिया उन्हें अहिंसा और शांति के दूत के रूप में स्वीकार करती है। इस वर्ष देश ही नहीं बल्कि पूरा विश्व उनकी 150वीं जयंती मना रहा है। महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती के उपलक्ष्य में इजराइल के दक्षिणी शहर किरयात गत में एक नामी चौराहे का नाम उनके नाम पर रखा गया है तो वहीं डोमिनिकन रिपब्लिक ने महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में एक डाक टिकट भी जारी किया था।

उनके बचपन के बारे में पढ़ने पर पता चलता है कि लड़कपन और जवानी में वह भी लापरवाह, मनमौजी और बाग़ी थे। उनमें भी अन्य नौजवानों की तरह ही वे ऐब थे जो जवानी का हिस्सा माने जाते हैं।  दो अक्टूबर 1869 को उत्तर पश्चिमी भारत की पोरबंदर रियासत में जन्मे थे। उनका खानदान अमीर था, पिता पोरबंदर रियासत के राजा के दीवान थे। उनकी मां धार्मिक महिला थीं, उन्होंने ही उनमें नैतिकता और हिंदू परंपराओं के प्रति हिदायतें दीं और शाकाहारी रहने पर बल दिया।

महात्मा ने भी पी थी शराब

अच्छी परवरिश के लिए उनके पिता परिवार को राजकोट ले आए। तेरह साल की उम्र में ही मोहनदास गांधी की शादी कर दी गई। लेकिन राजकोट में ही मोहनदास गांधी ने शराब पी और मांसाहार किया जबकि उनका पूरा परिवार सख्त शाकाहारी था। शराब और मांसाहार का ये दौर ज्यादा नहीं चला, उन्हें प्रायश्चित होने लगा। अपनी आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ में भी उन्होंने इस बात का जिक्र किया है। वह जल्दी ही संभल गए और फिर उसके बाद जीवन भर न तो कभी उन्होने शराब को हाथ लगाया न मांस को। लंदन में 1888 में कानून की पढ़ाई के दौरान उन्होंने वेस्टर्न डांस सीखने की तो कोशिश की लेकिन अपनी मां को दिए वचन का पालन करते हुए मांसाहार नहीं किया।

महात्मा ने भी पी थी शराब

इतिहासकार डेविड हार्डिमेन की बीबीसी में प्रकाशित रिपोर्ट उनके लंदन में प्रवास के दौरान शराबनोशी पर मौन है। इस रिपोर्ट के अनुसार गांधी जी लन्दन से वकालत की पढाई कर भारत लोटे लेकिन  यहां इन्हे कोई सफलता नहीं मिली। तभी उन्हें दक्षिण अफ्रीका में एक रईस गुजराती व्यापारी का मुकदमा लड़ने का ऑफर आया जिसे उन्होंने तत्काल स्वीकार कर लिया। 1914 में उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में नस्ली भेदभाव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया जब उन्हें रेल के फर्स्ट क्लास के डिब्बे से एक अंग्रेज ने सामान समेत फेंक दिया था। गांधी ने वहां रह रहे भारतीयों पर लगाए गए तीन पाउंड के टैक्स के खिलाफ आंदोलन शुरु कर दिया।  उन्होंने वहां भारतीय मजदूरों, खनन कर्मियों और खेतिहर मजदूरों को एकजुट कर उनके नेता बन गए। यहीं से वह अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ने लगे थे। दक्षिण एशिया प्रवास ने मोहनदास करमचंद गांधी को ऐसा रास्ता दिखाया कि वह विश्व के नेता के रूप में स्थापित हो गए। दक्षिण अफ्रीका प्रवास उनके जीवन का टर्निंग प्वाइंट था ।

चीयर्स डेस्क 

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