भू-जल संकट को बढ़ा सकते हैं सोलर पंप

देश में अभी 24 हजार सिंचाई वाले सोलर पंप हैं। इनमें ज्यादातर ऑफ ग्रिड हैं। यानी जिनपर भू-जल निकासी के लिए किसी तरह की निगरानी और नियंत्रण नहीं है। चिंताजनक यह है कि बहुत जल्द ही इनकी संख्या दोगुनी हो सकती है। इससे खेती-किसानी के लिए न सिर्फ भू-जल पर निर्भरता और अधिक बढ़ सकती है बल्कि भू-जल का अनियंत्रित दोहन भी काफी बढ़ सकता है। अनियंत्रित दोहन से   न सिर्फ भूजल स्तर में कमी आएगी बल्कि पीने के पानी की उपलब्धता पर भी असर पड़ेगा। प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाअभियान (पीएम कुसुम योजना) के जरिए ही 17 लाख 50 हजार ऑफ ग्रिड पंप और 10 लाख ग्रिड पंप लगाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके अलावा 10 गीगावाट छोटे सोलर पावर प्लांट भी लगाने का लक्ष्य रखा गया है। यह पंप लग जाएंगे लेकिन खतरे की घंटी बजा रहे भू-जल स्तर की निगरानी कैसे होगी, इसका कोई रोडमैप अभी तक नहीं है?

यह बातें सेंटर फॉर साइंस एंड एनवॉयरमेंट (सीएसई) की ताजा रिपोर्ट ‘सिल्वर बुलेट’ में कही गई हैं। रिपोर्ट में महाराष्ट्र के बुलधाना और उत्तर प्रदेश में पीलीभीत व आंध्र प्रदेश में विझियांग्राम के किसानों का सर्वे भी किया गया है। सिंचाई के लिए सबसे ज्यादा सोलर पंप इन्हीं तीन जिलों में अभी मौजूद हैं।

सीएसई में रीन्यूबल एनर्जी कार्यक्रम प्रबंधक मांडवी सिंह ने डाउन टू अर्थ से कहा कि पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में छूट (सब्सिडी) वाली बिजली के कारण भू-जल का जबरदस्त दोहन किया गया। इस बात के   पर्याप्त तथ्य हैं कि भू-जल संकट जैसे इसके भयानक दुष्परिणाम भी सामने आए। अगर ऑफ ग्रिड सोलर पंप की बात की जाए, जो कि संख्या में काफी ज्यादा हैं, न तो इनकी निगरानी और न ही इनके नियंत्रण का कोई प्रावधान किया गया है। ऐसे में यह भू-जल संकट के लिए बड़े कारक बन सकते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक देश में 70 फीसदी सिंचित क्षेत्र के लिए करीब 90 फीसदी (228.3 अरब घन मीटर) भू-जल की निकासी की जाती है। वहीं, सिंचाई के लिए इस्तेमाल होने वाले कुल 70 फीसदी स्रोतों में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी ट्यूबवेल्स की है। इन ट्यूबवेल्स का इस्तेमाल इसलिए भी बढ़ा क्योंकि राज्यों में बिजली की दरें काफी छूट के साथ खेती-किसानी के लिए पहुंचाई गईं।

बीते पांच वर्षों में सौर ऊर्जा वाले पंप की संख्या में दोगुना बढ़त हुई है। मार्च 2014 में सौर ऊर्जा पंपों की संख्या 11,626 थी जो कि मार्च, 2019 में बढ़कर 24 हजार तक पहुंच गई है। केंद्र और राज्य की ओर से मिलाकर इसके लिए करीब 90 फीसदी सब्सिडी दी जा रही है। वहीं, सौर क्षेत्र में हो रही ग्रोथ के कारण भी सौर पंप के दाम घटे हैं। मसलन ए 5 हॉर्स पावर (एचपी) सौर पंप की कीमत 56,000 रुपये है जिसकी कीमत एक दशक पहले 1.5 लाख रुपये थी। खासतौर से छत्तीसगढ़, राजस्थान और आंध्र प्रदेश में सौर पंप सबसे ज्यादा हैं। इन तीन राज्यों के सौर पंपों की कुल हिस्सेदारी 60 फीसदी है। छत्तीसगढ़ और राजस्थान में सौर पंपों का ज्यादा इस्तेमाल पेयजल के लिए वहीं, आंध्र प्रदेश में ज्यादा सौर ऊर्जा का इस्तेमाल सब्सिडी का बोझ कम करने के लिए किया गया है।

रिपोर्ट में ऑफ ग्रिड के बजाए ऑन ग्रिड सौर ऊर्जा पंपों पर जोर देने और लाभार्थियों की पहचान को दुरुस्त करने व उन्हें वित्तीय मदद दिलाने के साथ ही भू-जल दोहन की निकासी पर जोर देने की सिफारिश की गई है।

चीयर्स डेस्क 

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