भूमिगत पानी बना जहरीला अंदर से कमजोर हो रहे हैं लोग

छत्तीसगढ़ का एक गांव ऐसा है, जहां का भूमिगत पानी जहरीला है। लोग इस पानी को मजबूरी में पीते हैं और अपनी जान गंवाते हैं। एक अभिशाप की तरह लोग इस जहरीले पानी के शिकार हो रहे हैं। लोगों की मजबूरी है कि इन्हें पीने के लिए यही पानी उपलब्ध है। लोगों को पता है कि यह पानी अंदर अंदर उनकी किडनी गला रहा है और जिस्म को खोखला बना रहा है, बावजूद इसके लोगों के पास अपनी प्यास बुझाने का कोई दूसरा विकल्प नहीं है। पूर्व सरकार में एक फलोराइड रिमुवल प्लांट लगया था लेकिन वो अब किसी काम का नहीं हैं। अब धीरे धीरे यहां की आबादी कम हो रही है। लोग या तो गांव छोड़कर पलायन कर रहे हैं या फिर मौत के मुंह में समा रहे हैं। इस गांव में रह रहे युवक युवतियों की शादियां भी नहीं हो रहीं, जिसकी वजह से यहां की जनसंख्या बढ़ने की बजाय कम हो रही हैं।

मिट्टी की जांच में हैवी मैटल पाए गए

राजधानी रायपुर स्थित इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने सुपेबेड़ा की मिट्टी का परीक्षण किया था। मुम्बई के टाटा इंस्टीटयूट और दिल्ली के डॉक्टर भी अपने स्तर पर जांच कर चुके हैं। जबलपुर आइसीएमआर की टीम भी यहां जांच के लिए पहुंची। पीएचई विभाग ने पानी की जो जांच की थी, उसमें उन्हें फ्लोराइड और आरसेनिक की मात्रा ज्यादा मिली थी। उसके समाधान के लिए गांव में फलोराइड रिमुवल प्लांट लगा दिया गया था, मगर इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय द्वारा की गई मिट्टी की जांच में हैवी मैटल पाए गए थे, जिसमें कैडमियम और क्रोमियम भी ज्यादा मात्रा में शामिल है।

शुद्ध पेयजल पहुंचाने के लिए सरकार कर रही है प्रयास 

वर्तमान में कांग्रेस की सरकार ने सुपेबेड़ा में शुद्घ पेयजल पहुंचाने के लिए योजना बनाई है। करीब दो करोड़ रुपये की इस योजना से पास में बहती तेल नदी से पानी पहुंचाया जाएगा। तेल नदी पर पुल निर्माण और वाटर फिल्टर प्लांट के लिए 24 करोड़ रुपये भी स्वीकृत किए गए हैं। यहां के लोगों को शुद्ध पेयजल पहुंचाने के लिए पूर्व में जो वाटर फिल्टर और आर्सेनिक रिमुवेबल प्लांट स्थापित किए गए हैं, इनकी कार्यक्षमता पर सवाल उठते रहे हैं। प्लांट में पानी ठीक तरीके से शुद्ध नहीं हो पाने के कारण स्थिति में विशेष सुधार नहीं हुआ।

चीयर्स डेस्क 

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