भारतीय समाज में शराब को लेकर दोहरे मापदंड

एक इंटरनेट यूजर ने सवाल किया कि भारत में कितनी महिलाएं शराब का सेवन करती हैं? जवाब मिला कि मेट्रो में करीब 80%, 2 टियर शहरों में 40-45% और छोटे शहरों में 5% , सवाल और जवाब दोनों ही बड़े दिलचस्प हैं।  लेकिन इसपर एक और सवाल ने ध्यान आकर्षित किया कि आखिर कितनी महिलाएं शराब पीती हैं, इसकी जानकारी चाहिए क्यों?

सवाल एकदम सही है।  आखिर ये क्यों सोचा जाता है कि लड़कियां अगर शराब पी रही हैं तो वो गलत ही होगा, उसका चरित्र खराब ही होगा।  वो अगर धुंआ उड़ा रही है तो कैरेक्टरलेस और अगर अगरबत्ती जला रही है तो संस्कारी।  चाय के ठेले पर अगर कोई लड़की सिगरेट पीती दिख जाए तो जनाब उसे नजरों से ही मंजिल तक पहुंचाया जाता है।  जब तक आंखों से ओझल ना हो जाए तब तक लोग निहारते रहते हैं जैसे कोई अजूबा हो।

अगर कोई लड़की शराब पीती दिख जाए तो सभ्य लोग उसपर कमेंट कर वहां से हट जाते हैं। आदिकाल से ये प्रथा चली आ रही है कि हिंदुस्तान में संस्कारी बहू के चर्चे होते हैं।  जमाना तो बदला, लेकिन संस्कारी बहू की परिभाषा को सोशल मीडिया पर अपडेट करना शायद आलादर्जा भूल गया।  तभी तो देखिए आज भी महिलाओं के शराब पीने को उनके कैरेक्टर से जोड़कर देखा जाता है।  जो लोग अपने बेटों के लिए संस्कारी बहुएं ढूंढते हैं क्या उन्होंने कभी पूछा की बेटे पार्टियों में क्या करते हैं? क्या पार्टियों में अपनी पत्नियों को शराब पिलाना और कूल दिखाना अब स्टेटस सिम्बल नहीं समझा जाता ?

ऐसा नहीं है कि लड़कियों का शराब पीना सही है, लेकिन उतना ही गलत लड़कों का पीना भी है।  हां, अगर कोई पी रहा है तो उसे कैरेक्टरलेस मान लेना भी गलत है।  सोसाइटी फॉर्वर्ड हो गई है, विदेशों में यही कल्चर है, लेकिन वहां किसी भी लड़की को पीने के लिए कैरेक्टरलेस नहीं माना जाता तो फिर भारत में ऐसा क्यों, भारत में इसे एक अपवाद माना जाता है चलिए ठीक है, लेकिन फिर सभ्य समाज उन लड़कों को क्या कहेगा जो हुड़दंग मचाते हैं और शराब पीकर काफी कुछ गलत कर जाते हैं।  कुल मिलाकर इसे सही ना समझें, लेकिन इसे अपवाद भी ना बनाएं। इसलिए शराब पीने  या ना पीने  का किसी के कैरेक्टर से कोई लेना देना नहीं है।

चीयर्स डेस्क 

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