फेनी के सिवा गोवा कुछ नहीं बनाता

आवारागर्दी की नस फड़के तो उसे शांत करने के लिए गोवा बड़ी प्यारी जगह है। सघन वृक्षों पर इन दिनों लाल धूल जमी है। हर दिशा किसी छोर पर जाकर सुहानी हो जाती है। शुद्ध नीला समुद्र, जो बंबई में खोजे नहीं मिलता, वहां सर्वत्र है। काजू के बेतरतीब बिखरे पेड़ों के बीच लंबी, घुमावदार, सलेटी सड़कें पता नहीं कहां से कहां चली जाती हैं। गोवा समूचा एक गोवा है। भूगोल के विवरण में मैं नहीं उलझता। रेतीले किनारे हैं। जहां पोर-पोर से सूर्य की किरण पाने के लिए विदेशी यात्री-यात्रिगणियां लगभग नंग-धड़ंग लेटे हैं। टोकरी में बीयर की बोतलें बेचती गोवा कन्याएं ‘बीयर-बीयर’ चिल्लाती जोड़ा दर जोड़ा घूम रही हैं। सब कुछ वैसा है, जैसा सुना था। सुबह और शाम हलचल भरी होती है। दोपहर को गोवा आराम करता है। जूते में कील ठोंकने वाला भी मिल जाए तो भाग्य।

पता नहीं शांति है, जो यहां आलस जगाती है या आलस है, जो वहां शांति बनाए रखता है। भारत से लंबी पुर्तगाली की गुलामी ने इस गोवा को एक शब्द, एक भाव और एक मूलमंत्र दिया है- सुसोगाद। अर्थात खाओ, पियो, मौज करो। ‘ईट ड्रिंक एंड बी मैरी’ का दर्शन। इसीलिए उन सालाजारों ने शराब को सस्ती और आदमी को चुस्त रखा। गोवा की धरती पर जनसंख्या का भार कम है, आय के साधन सीमित हैं। पूरी मिट्टी में लोहा है। एक पत्थर उठाइए, वह उत्तर भारत के उसी आकार के पत्थर से भारी पड़ेगा। काजू की बनी शराब गोवा की आत्मा को बड़ी कम कीमत में तृप्त रखती है। समुद्र उन्हें मछली देता है, धरती चावल उगाती है। मांडवी और जुआरी नदियां पीने का पानी देती हैं। बस, जीवन जीने और मौज करने को पर्याप्त तत्व हैं। बेकारी है पर इतनी नहीं। यहां युवकों को एक अदद मोटरसाइकिल मिल जाए, पीछे एक लड़की बैठी हो। रास्ते में कदम-कदम पर बार-मैखाना है, सुख है। पूरे गोवा में खपरैलों वाले छोटे-छोटे सुंदर घर फैले हैं। कोई ऊंचाई पर, कोई नीचे बरामदों वाले शांत घर। खपरैल मंगलौर से जहाजों में भर-भरकर आती है। गोवा फेनी नामक दारू के अतिरिक्त कुछ नहीं बनाता।

पता नहीं, तिहाड़ से भागकर चार्ल्स शोभराज यहां क्या आशा बांधकर आया था/ मैंने उसी काकेरिया नामक होटल में बैठकर एक लिम्का पिया जहां उसे पकड़ा गया था। बाहर खुला भाग है, कई टेबलें बिखरी हैं, अंदर विचित्र-सी सजावट वाला बार है। वहां एक ध्येय वाक्य लिखा है- हैंगओवर की स्थिति टालने के लिए निरंतर पीते रहो। होटल के बाहर वाले बस स्टॉप को पास के कॉलेज के छात्र ‘चार्ल्स शोभराज स्टॉप’ कहते हैं।

यों गोवा में नागरिक की शहंशाही का मजा यह है कि बस जहां रुकने को कहो, वहीं रुक जाती है। राउरे की ध्वनि निरंतर सुनाई देगी। आदमी बस स्टॉप तक नहीं जाता। वह अपने घर के सामने खड़ा हो, बस रुकवा, बैठ जाता है। किसी को जल्दी भी नहीं है। लोगों को किसी डांबोलिम से बांबोलिम जाना होता है। पुर्तगालियों ने यहां के सभी नामों के आगे ‘इम’ लगा दिया है। पंजिम का वास्तविक नाम पाणाजी है। शिवाजी के पूर्वज के नाम पर, जिसने गोवा विजय किया था। इसी तरह कांडो को कोंडोलिम, पलाल को पलोलेम, सिंकेरी को सिंकेरिम। पूरे गोवा में सुंदर-सजीले गांव हैं। कोंकणी लोक-संगीत या विदेशी संगीत किसी एक छोर पर बजने लगे तो पूरा मोहल्ला पैर हिलाने लगता है। ‘घे-घे रे साइबा’ या ‘मक नक गो’। ‘मक नक गो’ का अर्थ मुझे नहीं चाहिए। ‘नक नक गो’ अर्थात नहीं, नहीं चाहिए। यहां चाहिए के लिए मराठी का पाहिजे नहीं बोलते। इसके लिए शब्द है जाम। कोंकणी में टेबल की बजाय मेज कहा जाता है। यहां मुझे पता लगा कि कमीज पुर्तगाली शब्द है। मेज भी। जीवन पर इसी का प्रभाव है।

छोटे-बड़े चर्च हैं, मंदिर हैं। गोवा में यों कुछ भी देखने लायक नहीं। पूरा गोवा देखने लायक है। राज्य बन गया है, आर्थिक तंतु बड़े नाजुक हैं। सैलानियों का आना दूसरे नंबर का उद्योग है कच्चे लोहे के बाद, और यहां सैलानी आते रहेंगे। मैं दो दिन रहा, पर बीस दिनों रहने की इच्छा लेकर लौटा। सुसोगाद का दर्शन लेकर मजे करो।

शरद जोशी 

loading...
Close
Close